ए धनि मोहे ना करु आरु छन्द
AI-निर्मित अनुवाद — समीक्षा लंबित
यह स्त्री अब किसी अन्य काम में मन नहीं लगा पाती; ऐसा प्रतीत होता है कि वह मन-ही-मन चन्द्र-सम श्याम से पहले ही मिल चुकी है।
वह दूर-दूर तक निहारती हुई गहरी साँसें भरती है; कदम्ब का फूल खिल चुका है, और उसका मुख बार-बार भारी होकर उसकी हथेली पर टिक जाता है।
हर क्षण उसका शरीर किसी नई मुद्रा में मुड़ जाता है; निरन्तर उसके अंगों पर रोमांच की छोटी-छोटी कलियाँ उभर आती हैं।
वह अपने हृदय का भाव जितना भी छिपाने का प्रयत्न करे, वह छिपा नहीं रहता; उसके हृदय की पीड़ा उसके मुख पर पूरी तरह स्वयं ही प्रकट हो जाती है।
वह बड़े प्रयत्न से अपने चंचल नेत्रों को रोकती है; गद्गद स्वर में वह केवल टूटे-फूटे, अधूरे शब्द ही बोल पाती है।
किसी एक बहाने से उसके अंग हिलते हैं, किसी दूसरे बहाने से उसकी आँखें राह की ओर भटकती हैं; वह बार-बार अकेली ही इधर-उधर टहलती रहती है।
गुरुजनों का आदर और लज्जा तो अब दूर ही रहें। गोविन्द दास कहते हैं, वह गहरी विपत्ति में पड़ गई है।