गो रख जगै सिन्ग ध्वनि
AI-निर्मित अनुवाद — समीक्षा लंबित
भोर में गोपों के सींग की ध्वनि सुनकर जटिला भिक्षा लेकर आई और अर्पित की, परन्तु मौन योगेश्वर ने केवल सिर हिलाकर उसे स्वीकार करने से मना कर दिया।
जटिला ने कहा, 'तो फिर बता, तुझे क्या चाहिए।' योगी ने स्पष्ट कर दिया, 'मैं भिक्षा केवल तेरी पुत्रवधू के हाथ से ही लूँगा, उसे शीघ्र यहाँ भेज दे।'
'यदि मैं उसके बदले में कुछ पाए बिना ही भिक्षा ले लूँ, तो योगी के रूप में मेरा व्रत भंग हो जाएगा,' उसने कहा। यह सुनकर उसका शरीर पुलकित हो उठा, और वह दौड़कर अपनी पुत्रवधू से बात करने गई।
'द्वार पर एक परम मनोहर महायोगी खड़े हैं; उनकी मुद्रा से मुझे लगता है कि वे सच्चे ज्ञानी पुरुष हैं। बड़े यत्न से बहुमूल्य वस्तुओं से भरी थाली सजाकर स्वयं जाकर उन्हें भिक्षा दे।'
यह सुनकर राधा उठ खड़ी हुईं और बोलीं, 'मैं इस योगी के पास जाऊँगी।' जटिला ने कहा, 'निःसंशय रह, उनके दर्शन मात्र से ही बड़ा लाभ होगा।'
गेहूँ के आटे से भरी थाली और घी से भरे स्वर्ण-पात्र को जोड़े हाथों में लेकर राधा पास आते हुए पुकार उठीं, और उन्हें देखते ही उनका हृदय काँप उठा।
योगी ने कहा, 'मैं यह भिक्षा नहीं लूँगा, मुझे तेरे ही मुख से केवल एक बात चाहिए, जाकर नन्द-नन्दन के प्रति तेरे मन में जो भी अभिमान शेष है, उसे क्षमा कर दे।'
यह सुनते ही राधा ने आँचल से अपना मुख ढक लिया, क्योंकि वह वेष धारण किए स्वयं नटराज ही थे। गोविन्द दास कहते हैं कि अभिनेताओं में शिरोमणि उन्होंने इस प्रकार अपने हृदय का प्रयोजन सिद्ध किया और वहाँ से चले गए।