होत शुभ अधिबास शुभ क्षणे, गगने सुर गण मगन गण सने
शुभ क्षण में प्रभु गौर का शुभ अधिवास अनुष्ठान मनाया जा रहा है। उस समय देवता आकाश में एकत्र हैं। प्रसन्न मन से वे सदा प्रभु गौर की लीलाओं की ही चर्चा करते हैं। शुभ क्षण में रसिकों के शिरोमणि प्रभु गौर सिंहासन पर विराजमान हैं। वे बड़ी शोभा से दीप्त हैं। उनकी कान्ति सोने के दर्पणों के अभिमान को हरा देती है। उनका सुन्दर रूप कामदेव को जीत लेता है।
उनके मुख का चन्द्रमा आकाश के चन्द्रमा के अभिमान को चूर-चूर कर देता है। उनकी कोमल, अति कोमल मुस्कान हृदय को आनन्द देती है। उनके नेत्र मनोहर हैं। वे कमल के फूलों की तरह चमकते हैं। उनके माथे का तिलक शोभा दे रहा है। उनकी भुजाएँ वक्ष के किनारे दो सर्पों के समान हैं। उनकी कमर पतली है। उनका एक-एक अंग सुन्दर और मनभावन है। उनके घुँघराले केश चमकते हैं। उनके समान कोई नहीं है। वे इस संसार के हर प्राणी का हृदय मोह लेते हैं।
उनकी ऐसी मधुरता को देखकर सज्जन लोग सोचते हैं कि हमने अवश्य ही बहुत से पुण्य किए होंगे। वादक वीणा पर अनेक प्रकार के राग बजाते हैं। वह मधुर ध्वनि कानों के लिए अमृत है। वादक अपने-अपने वाद्य बजाते हैं। मृदंग और मुरज मधुर ध्वनि में कहते हैं: “ठोंग ठोंकृण झिकिकु झांकिट ठिटिठि टनन नन!”
नर्तक नाचते हैं। वे हाथों से सुन्दर भावपूर्ण मुद्राएँ करते हैं। वे सुन्दर ढंग से नाचते हैं। उनके नाचते पैरों की थाप कहती है: “तक तक थैत थैतत धाधिलि लिलिलि लललइ!” “जय! जय!” की ध्वनि संसार में भर जाती है। ब्राह्मण वेदों का पाठ करते हैं। स्त्रियाँ “उलू-लुलु!” की ध्वनि करती हैं। अब घनश्याम का हृदय आनन्द से उमड़ पड़ा है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरहरि दास
- पद
- 4