कि आनन्द शचीर भबने
शची के घर में कैसा आनन्द छाया है! अब शुभ विधि सम्पन्न हो रही है।
विवाह-समारोह का विधिपूर्वक स्नान अब पूरा हो चुका है। प्रभु गौर-हरि एक अनुपम सिंहासन पर बैठे हैं।
उनके सुन्दर रूप की शोभा मन को मोह लेती है। उनके चमकीले घुँघराले केश सुन्दर और शोभामय हैं।
प्रभु गौर के पास उनके प्रिय संगी हैं। उन्हें एक बार देख लेने पर कोई भी उनसे अपनी आँखें नहीं हटा पाता।
सबके हृदय में कितना आनन्द भरा है? कोई नहीं जानता। विवाह के वस्त्र और अलंकार अनेक प्रकार के और शोभामय हैं।
नरहरि भला कैसे वर्णन करे? वह इस सबकी अनुपम शोभा से अभिभूत हो गया है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरहरि दास
- पद
- 6