Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

जय जय जय मङ्गल रब, फाल्गुन पूर्णिमा निशि नब शोभित

जय जय जय मङ्गल-रब, फाल्गुन-पूर्णिमा-निशि नब शोभित शची-गर्भे प्रकट गौर बरज-रण्जना झलकत बर बालक-तनु, कुङ्कुम थिर दामिनी जनु चमकत मुख-चन्द मधुर धैरज भर भण्जना
अर्थ

“जय! जय! जय!” की मंगलध्वनि हो रही है। फाल्गुन की एक सुन्दर पूर्णिमा की रात में शची के गर्भ से भगवान गौर का गौर रूप प्रकट हुआ है। ये भगवान गौर वास्तव में व्रज के आनन्द कृष्ण ही हैं। शिशु भगवान गौर तेजस्वी हैं। वे कुंकुम जैसे हैं, या सदा चमकती रहने वाली बिजली की कौंध जैसे हैं। उनके चन्द्रमा जैसे मुख की मधुरता सबको आश्चर्य से भर देती है और सबके शान्त धैर्य को टुकड़े-टुकड़े कर देती है।

पहुं प्रकाशे निरखत, घन-गण सह सुर-गण गगने बरषत कुसुमाबली बिपुल पुलक भरल अङ्गही करत कत मनोरथ चित, चञ्चल भणि चारु चरित लोचन जल-छल कत छबि पायत बहु रङ्गही
अर्थ

बादलों पर बैठे देवता भगवान गौर को निहार रहे हैं। वे आकाश से फूल बरसाते हैं। आनन्द की पुलक से उनके शरीर के रोम खड़े हैं। देवताओं के हृदयों से कितनी ही कामनाएँ उठती हैं, ऐसी कामनाएँ जो चंचल और सुन्दर शब्दों के रूप में प्रकट होती हैं। देवताओं की आँखों से कितनी ही आनन्दमय कान्ति बह रही है, ऐसी कान्ति जो आँसुओं का रूप धरकर बह रही है।

गायत किन्नर सुधङ्ग, बायत मृदुतर मृदङ्ग धाधिकि धिकिता धिक् धिक् धिक् कटतक् धिन्नाना नृत्य-सुर नर्तकी-चय, बिबिध भाति करु अभिनय उघटतत कथै थै थै ति अ-इ अ-इ अतेन्नाना
अर्थ

किन्नर मधुर गान करते हैं। मृदंग मधुर स्वर में कहते हैं, “धाधिकि धिकिता धिक् धिक् धिक् कटतक!” देवलोक की नर्तकियाँ नृत्य करती हैं। उनके नृत्यों में अनेक प्रकार के सुन्दर अभिनय किए जाते हैं। ढोल कहते हैं, “कथै थै थै ति अइ अइ!”

निर्मल दश-दिश उजोर, मलयानिल बहत थोर पिक-कुल कुहु कत बसन्त ऋतु-पति सर साय-ए उछलत सुर-सरित-बारि, नदीया महि मुद बिथारि मिश्र-भुबन कौतुके नरहरि हिय उनमताय-ए
अर्थ

दसों दिशाएँ उज्ज्वल और निर्मल हैं। मलय पर्वत से सुगन्धित हवाएँ बह रही हैं। कोयलें “कुहू!” कहकर कूक रही हैं। ऋतुराज वसन्त के कितने ही सुन्दर लक्षण प्रकट हो रहे हैं? स्वर्ग की गंगा मधुर रूप से बह रही है। नदिया आनन्द से भर गया है। जगन्नाथ मिश्र के घर में जो अद्भुत बालक प्रकट हुए हैं, वे नरहरि के हृदय को आनन्द से उन्मत्त कर रहे हैं।

इस भजन के बारे में

रचयिता
नरहरि दास
पद
4