परम शुभ शची गभे बिलसत गौर गोकुल नाह
गौर वर्ण का रूप प्रकट करके गोकुल के स्वामी शची के परम मंगलमय गर्भ से शोभायमान रूप में प्रकट हुए। देवता वहाँ आए। भवन को भरकर उन्होंने झुककर प्रणाम किया और स्तुति की।
फाल्गुन मास की शुभ पूर्णिमा की रात को उदय होते हुए चन्द्रमा को राहु ने निगल लिया। उसी समय भगवान ने सबसे पहले अपने पवित्र नाम को प्रकट किया। उसके अगले ही क्षण उन्होंने अपना रूप प्रकट किया।
“जय! जय!” की ध्वनि से संसार भर गया। किसी को चैन नहीं था। जगन्नाथ मिश्र के घर में शिशु को देखकर सब आनन्द से उन्मत्त हो गए।
नये-नये प्रकार के वैभव और मंगल प्रकट हुए। सबकी इच्छाएँ पूरी हो गईं। नरहरि कहते हैं: उसी क्षण बलवान कलियुग का घमण्ड चूर-चूर होकर धूल बन गया।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरहरि दास
- पद
- 4