जय जय मधव विधु सङ्गिनि रधे
हे राधे, हे भगवान कृष्णचन्द्र की सखी, हे देवी, कृष्ण से आपके मिलन ने विरह की सारी पीड़ा झटककर दूर कर दी है। आपकी जय हो! आपकी जय हो!
हे देवी, भगवान कृष्ण के साथ आपके विवाह के समय आपकी शोभा देखते ही बनती थी। हे देवी, आप भगवान कृष्ण के हृदय में निवास करती हैं...
हे मधु से भरे माधवी पुष्प, आप भगवान कृष्ण के नेत्र रूपी भौंरे को अपनी ओर खींचती हैं। हे भगवान कृष्ण की प्रिय गोपियों की वसन्त-ऋतु जैसी शोभा...
हे देवी, आपका कमल जैसा मुख भगवान कृष्ण के भ्रमर को सुख देता है। हे देवी, आप भगवान कृष्ण के वक्षःस्थल पर रेखा बनकर विराजमान हैं...
हे देवी, आप भगवान कृष्ण के वक्षःस्थल को प्रेम के उन्माद में गले लगाती हैं। हे देवी, आप भगवान कृष्ण के प्रति तीव्र अनुराग से भरी हैं। हे देवी, आपकी मधुरता ने हर आपत्ति का खण्डन कर दिया है...
आप भगवान कृष्ण के हृदय की शोभा और मधुरता हैं। कृपया यहाँ वृन्दावन के वन में सदा उनके साथ लीलाएँ कीजिए।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- जीव गोस्वामी · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- गोपाल-चम्पू
- पद
- 6