Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

जय जय सद् गुण सर

टेक
जय जय सद्-गुण-सर जगति विशिष्टं कलयितुम् इष्टं गोकुल-लसद्-अवतर
अर्थ

हे परम सद्गुणी प्रभु, आप जगत को सर्वश्रेष्ठ दिव्य उपहार देने के लिए गोकुल में अवतरित हुए। आपकी जय हो! आपकी जय हो!

कमलभवेश्वर-वैकुण्ठेश्वर-पत्नी-चिन्तितम् एव रजसि रसे वलित-विलसे निज-रमणीभिर् देव
अर्थ

ब्रह्मा, शिव और वैकुण्ठेश्वर नारायण की पत्नी लक्ष्मी, सब आपका ध्यान करते हैं। हे प्रभु, आप अपनी सुन्दर गोपी-प्रियाओं के साथ रास के क्रीड़ामय नृत्य में शोभायमान होते हैं।

नटवत् परिकर निखिल-कलधर रचित-परस्पर-मोद अलिङ्गन-मुखरिततम-मह-सुख बल्लव-वधु-हृत-तोद
अर्थ

हे प्रभु, आप गोपियों के साथ सुन्दर नृत्य का आनन्द लेते हैं। आप स्नेह भरे वचनों और आलिंगनों से उन्हें प्रसन्न करते हैं और उनके दुःख दूर करते हैं।

व्यतिवीक्षण-कृत-शत्विक-परिवृत-मण्डलम् अनु बहु-मुर्ते व्रज-तरुणी-गण-रचित-नयन-पणस चित-वशी-कृति-पुर्ते
अर्थ

हे प्रभु, भाव-विभोर होकर आपको निहारती हुई प्रत्येक गोपी के पास खड़े होने के लिए आपने अनेक रूप धारण कर लिए हैं। व्रज की युवा गोपियों की दृष्टियों ने आपको पूरी तरह मोल ले लिया है।

चरण-कञ्ज-धृति-कर-पल्लव-कृति-चिल्ली-वलित-विहरन् मध्य-भङ्ग-तति-मणि-कुण्डल-गति-पुलक-स्वेद-विकरन्
अर्थ

नृत्य करते हुए गोपियाँ अपने कमल-जैसे चरणों, पंखुड़ी-जैसे हाथों और भौंहों को सुन्दर ढंग से चलाती थीं। वे कमर लचकाती थीं, उनके मणि-कुण्डल झूलते थे, उनके शरीर के रोएँ खड़े हो जाते थे, उन्हें पसीना आता था और उनमें आनन्द के भाव-विकार प्रकट हो रहे थे।

कलयति भवत घन-सम्यवत तडिद् इव सर्व ललन अपि वः परिमिति-तर-तमतम् इति सेयं ज्ञपयति तुलन
अर्थ

हे प्रभु, आप काले वर्षा-मेघ के समान हैं और सभी गोपियाँ बिजली की चमक के समान हैं। यह तुलना पूर्णतः सटीक है।

सु-मधुर-कन्ठे नृत्योत्कन्ठे तव रति-मत्र-प्रीते त्वत्-स्पर्शमृत-मद-चय-सम्वृत-चित्ते भव-क्रीते
अर्थ

गोपियाँ मधुर स्वर में गाती हैं और नृत्य के लिए उत्सुक रहती हैं। आपकी प्रेममयी चेष्टाएँ ही उनका एकमात्र सुख हैं। आपके स्पर्श का अमृत उनके हृदयों को आनन्द से भर देता है। वे आपके प्रेम से मोल ली हुई हैं।

युवती-जते गीतज-शतेनवृत-विश्व-प्रभवे यस् त्वं रजसि तत्-सुख-भग् असि नम एतस्मै प्रभवे
अर्थ

जब गोपियों का गान सारे विश्व को आनन्द से भर देता है, तब आप भी उस आनन्द से दमक उठते हैं। हे प्रभु, मैं आपको आदरपूर्वक दण्डवत् प्रणाम करता हूँ।

य सह भवत विस्मयम् अवत स्वर-जतीर् अति-शुद्धम् गयति सेयं निखिलैर् गेयं कलयति निज-गुण-रुद्धम्
अर्थ

जब कोई एक गोपी आपके साथ मधुर स्वर में गाती है, तब आप विस्मय से भर जाते हैं। वही गोपी सब गोपियों के साथ आपके दिव्य गुणों का गान करती है।

तत उत्कर्षं वलयित-हर्षं वलयति येयं गने स श्री-रध वलितरध भवत कलित मने
अर्थ

श्रीमती राधारानी का गान आपको बड़ा आनन्द देता है। उसके उत्तर में आप बड़े आदर से उनकी पूजा करते हैं।

येयं रसे श्रमज-विलसे विगलन्-मल्ली-वलय स भवद्-अंसे लसद्-अवतंसे धरति करं वर-कलय
अर्थ

रास-नृत्य की लीलाओं से थकी हुई, जिनके चमेली के कंगन खिसक रहे हैं, वे आपके उस कन्धे पर सुन्दर ढंग से अपना हाथ रखती हैं, जिसे आपके चमकते कुण्डल छू रहे हैं।

य चंसं परिभुज-परिघं परिचुम्बति तव स-विनोदम् हृष्यति सेयं तन्व्-अगनेयं यद्-रोम च समोदम्
अर्थ

वे हँसी-खेल में आपकी भुजा और कन्धे को चूमती हैं। वे बहुत प्रसन्न हैं। दूसरों को पता चले बिना, आनन्द से उनके शरीर के रोएँ खड़े हो जाते हैं।

चल-कुण्डल-धर गण्ड-मुकुर-वर समिष-स्पर्श-विधने तम्बुल-द्रव-परिवर्तद् द्रवम् अयसे चुम्बन-दने
अर्थ

हे प्रभु, आपके कुण्डल इधर-उधर झूलते हैं! हे प्रभु, आपके गाल सुन्दर दर्पण हैं! किसी बहाने से आप उन्हें छूते हैं। उन्हें चुम्बन देते हुए आप दोनों चबाए हुए ताम्बूल के रस का आदान-प्रदान करते हैं।

एष नर्तन-कीर्तन-वर्तन-शिञ्जित-जत-सुतल तव रमनुज करम् अतुलम्बुज-मिषम् अधद् धृदि बल
अर्थ

यह बाला गाने और नाचने में निपुण है, और उसके हिलते हुए गहने सुन्दर ताल में झंकार करते हैं। हे रामानुज (बलराम के छोटे भाई), आपके हाथ को अनुपम सुन्दर कमल मानने का बहाना करके वह उसे अपने हृदय पर रख लेती है।

अथ रस-क्रम-परिवलित-श्रम-वनित-लक्षित-देह परितो-भ्रमणक-गण-विश्रमणक स-मुदित-परम-स्नेह
अर्थ

हे प्रभु, आप रास-नृत्य में गोपियों की थकान को देख लेते हैं और उन्हें विश्राम कराते हैं। आप प्रसन्न और स्नेहमय हैं।

कवि-कृत-निश्चय-शुभ्र-यशश्-चय मल-समुदय-हरिन् जय जय जय जय जय जय जय जय जय जय रस-विहरिन्
अर्थ

हे प्रभु, श्रेष्ठ कवि और दार्शनिक आपके उज्ज्वल यश का वर्णन करते हैं। आप फूलों की मालाओं से सुशोभित हैं। हे रास-विहारी, आपकी जय हो, जय हो, जय हो, जय हो, जय हो, जय हो, जय हो, जय हो, जय हो, जय हो!

इस भजन के बारे में

पद
16