कृष्नम् अपश्यन् पीत दुकुलम्
यज्ञ-पत्नियों ने कृष्ण को निहारा। पीले वस्त्र पहने हुए वे वर्षा ऋतु के बादलों और बिजली की शोभा के मूल स्रोत थे।
उनके सिर पर मोरपंखों का मुकुट था और वक्ष पर फूलों की माला। गोवर्धन पर्वत के खनिज रंगों से सजे हुए वे सन्ध्या के समय के इन्द्रधनुष से भी अधिक सुन्दर थे।
अन्धकार को प्रकाशित करने वाले सूर्योदय का सुन्दर लाल रंग उनके केशों में सजे फूलों जैसा बनने की लालसा करता है।
उनके मस्तक पर घुँघराली लटें थीं, कान कमल जैसे थे और गाल उभरे हुए थे। उनका मुस्कुराता मुख दो तारों वाले गोल चन्द्रमा के समान था।
अत्यन्त सुन्दर और नर्तक नट के वेश में अद्भुत रूप से सजे हुए वे ऐसे लग रहे थे, मानो कोई राजसी मेघ अमृत की वर्षा करने आया हो।
उनकी भुजा एक गोप सखा के कन्धे पर टिकी थी। उनके अद्भुत दाहिने हाथ की शोभा ने निर्मल कमल-पुष्पों को भी फीका कर दिया।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- जीव गोस्वामी · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- गोपाल-चम्पू
- पद
- 6