मरकत दरपण बरण उजोर
उनका वर्ण मरकत-मणि के दर्पण-सा उज्ज्वल है; उनके एक-एक अंग को देखना मानो साक्षात कामदेव से अभिभूत हो जाना है।
उनके अरुण नयनों ने क्या कहा, मैं समझ न पाई; इसीलिए पुष्पबाण कामदेव ने मुझ पर बाण चला दिए।
हे सखी, मैं नन्द-नन्दन से क्यों मिली? मेरा घर घना वन बन गया और चन्दन अग्नि हो गया।
उसी क्षण दक्षिणी पवन भी प्रतिकूल हो गया; मैं शीतल चन्द्रमा का नाम तक सुनना सहन नहीं कर पाती।
कमल-दलों से बिछी हुई सहज शय्या पर, वह कुलीन सती युवती जाकर अपना स्थान ग्रहण करे।
वहीं उसका मन स्थिर रहा, उसकी आँखें वहीं टिकी रहीं; धैर्य और लज्जा दोनों दूर भाग गए।
व्याकुल हृदय के साथ अकेले रहने से क्या लाभ? गोविन्द दास कहते हैं: जाओ और कान्हा से मिलो।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- गोविन्द दास कविराज · जीवनी पढ़ें
- पद
- 7