मुदित नयने हिया भुज युग चापि
आँखें मूँदे, अपनी दोनों मुड़ी भुजाओं से छाती दबाए, हरि वहाँ चुपचाप लेटे रहे, कुछ भी नहीं बोले।
बातों-बातों में जब तुम्हारा नाम लिया गया, तभी उन्होंने आँखें खोलीं और मेरे मुख की ओर देखा।
हे सुन्दरी, इस बारे में और कुछ मत कहो, चन्द्रमा-से श्याम अब पूरी तरह केवल तुम्हीं में लीन हो गए हैं।
जिन नेत्रों की चितवन को कामदेव भी सहन नहीं कर सकता, उन्हीं नेत्रों से अब आँसुओं की लहरें बह रही हैं।
जिन अधरों पर सदा मिठास मुस्कुराती थी, वे अब निस्तेज हो गए हैं, केवल लम्बी आहें भर रहे हैं।
विद्यापति कहते हैं यह कोई मिथ्या नहीं, ऐसा ही सचमुच प्रतीत होता है; गोविन्द दास वहीं रहकर उस दृश्य के साक्षी बने रहते हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- गोविन्द दास कविराज · जीवनी पढ़ें
- पद
- 6