नहि उठल दोंहे कुण्डक तीर
स्नान करके वे दोनों कुण्ड के तट पर आए; उनके पतले वस्त्र उनके अंगों से चिपक गए।
अपने शरीरों पर उन्होंने नित नए वेश धारण कर लिए थे; वे दोनों साथ-साथ कुंज में प्रवेश कर गए।
यहाँ-वहाँ से भेंट में आई तरह-तरह की मिठाइयाँ उन्होंने मिलकर खाईं, कितने ही प्रकार की।
राधा के यत्न से उन्हीं श्याम प्रभु ने हृदय में हर्ष भरकर अनेक प्रकार से भोजन किया।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- गोविन्द दास कविराज · जीवनी पढ़ें
- पद
- 4