नव युव द्वन्द्व दिदृक्षाष्टक
जिनकी दिव्य देह-सुगन्ध निर्मल मधु से भरे दमकते कमलों और ताज़ी कस्तूरी की गन्ध को भी मात देती है, और यहाँ आपस में उठते भावों से जिनके मन भीतर ही भीतर उन्मत्त होकर डोलते हैं, व्रज की भूमि में उस सदा युवा युगल-रत्न के दर्शन की मुझे लालसा है।
स्वर्ण-पर्वत की ढलान पर खिले केतकी पुष्पों के बीच नए मेघ की माला को भी मात देने वाली दिव्य कान्ति से युक्त, एक-दूसरे को निहारते हुए मानो चंचल, आनन्दमय क्रीड़ा में लीन, व्रज की भूमि में उस सदा युवा युगल-रत्न के दर्शन की मुझे लालसा है।
जिनके सुन्दर चरण-नखों के अग्रभाग को करोड़ों अनुपम नवीन गौरियों और नये कामदेवों की प्रसिद्ध मधुरता की लहरें धोती हैं, और जो एक-दूसरे की नित नई, प्रिय कान्ति और अनुराग से आनन्दित हैं, व्रज की भूमि में उस सदा युवा युगल-रत्न के दर्शन की मुझे लालसा है।
जिनके चन्द्रमुख, परस्पर लज्जा से हल्के झुके हुए, प्रेम-रस में डूबे कमल-नेत्रों के कोर के नृत्य से सुशोभित हैं, एक-दूसरे की मधुर वाणी सुनने की इच्छा जिनमें निरन्तर बढ़ती जाती है, व्रज की भूमि में उस सदा युवा युगल-रत्न के दर्शन की मुझे लालसा है।
प्रेम की क्रीड़ामय होड़ के उमड़ते भाव जिनके अंगों पर रंग-ढंग से झलक रहे हैं, जिन्हें युवा सखियाँ चुपचाप आँखों की कोर से देख रही हैं, और जिनके मुख मधुर मुस्कान भरी चितवनों के साथ लाज से खिले हुए हैं, व्रज की भूमि में उस सदा युवा युगल-रत्न के दर्शन की मुझे लालसा है।
जो प्रेम की होड़ के आचरण के आचार्य हैं; जिनके चरणों की सेवा के लिए वे नई वधुएँ भी प्रार्थना करती हैं जिनका पुण्य अभी पूरा नहीं हुआ; जो प्रेम-रस के रसिक हैं, जिनके दोनों में एक ही प्राण है, और जो एक-दूसरे के आभूषण हैं, व्रज की भूमि में उस सदा युवा युगल-रत्न के दर्शन की मुझे लालसा है।
सुन्दर सरोवर के तट पर मधुर कुंज में, खूब जल-क्रीड़ा करके थके हुए जो दोनों स्नेही सखियों की टोलियों द्वारा बड़े चाव से लाए गए मधु-पेय एक-दूसरे को पिलाते हैं, व्रज की भूमि में उस सदा युवा युगल-रत्न के दर्शन की मुझे लालसा है।
यहाँ परस्पर प्रेम की रस्सी से बँधे हुए, कामदेव के ही रस की बाढ़ों से गुँथे हुए, परस्पर आकर्षण की प्रगाढ़ शक्ति से, समस्त ब्रह्माण्ड में राधा-माधव के नाम से प्रसिद्ध, व्रज की भूमि में उस सदा युवा युगल-रत्न के दर्शन की मुझे लालसा है।
जो कोई बड़े परिश्रम और अपार दीनता के साथ, सदा नवीन युवा युगल के दर्शन की चाह से भरे, प्रेम से मधुर इस अष्टक का पाठ करता है, वह सचमुच सहज ही परम शोभा की राशि उस अतुलनीय दिव्य युगल को निकट से अपनी आँखों से निहारकर उनकी सेवा करता है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- रघुनाथ दास गोस्वामी · जीवनी पढ़ें
- पद
- 9