निताइ आमार परम दयाल
मेरे प्रभु निताई परम दयालु हैं। दिव्य प्रेम के सागर से नहर खोदकर भगवान निताई ने इस संसार को प्रेम की बाढ़ से भर दिया। इस तरह उन्होंने इस संसार को बड़ा सौभाग्यशाली बना दिया।
जब प्रेम की उन लहरों की बाढ़ ने संसार को भर दिया, तब कोई भी अछूता नहीं रहा। पापी और तपस्वी, सब उस प्रेम के सागर में तैरते चले गए। भक्त मिलकर उस प्रेम के सागर में खेलने लगे। कभी-कभी उनमें से कोई उसे तैरकर पार भी कर जाता था।
नदिया के नगर उस प्रेम के सागर में डूब गए। शान्तिपुर नगर भी उसी प्रेम के सागर में डूब गया। भक्त उस सागर में खेलते रहे। यह सब देखकर भगवान निताई हँसते हैं। वासुदेव घोष उस सागर की लहरों से इधर-उधर उछाले जाते हैं। कभी वे ऊपर धकेल दिए जाते हैं और कभी लहरों के नीचे डूब जाते हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- वासुदेव घोष · जीवनी पढ़ें
- पद
- 3