प्रेम पूराभिध स्तोत्र
मधु-सी मधुर, चाँदनी से जगमगाती रात्रि में, सुन्दर वस्त्र और श्वेत पुष्प धारण किए, कर्पूर से अलंकृत, अपना हाथ अपनी दूती के हाथ पर रखे, सुबल के सखा से मिलने जाती हुई, हे राधे, क्षणभर के लिए भी मेरे नेत्रों को अपने दर्शन से आनंदित करो!
वाम-भाव से प्रेम-कुंज में प्रवेश न करके, घर जाने के लिए रास्ते पर चलती हुई, उनके द्वारा झट से रोक ली जाने पर, और उनकी बलपूर्वक की गई मनुहार से जिनकी आँखों में भीतर-ही-भीतर मुस्कान ला दी गई है, ऐसी हे राधे, क्षणभर के लिए भी मेरे नेत्रों को अपने दर्शन से आनंदित करो!
माधव के उन्नत, मेघ-से सुन्दर वक्षस्थल पर कभी स्थिर, कभी चंचल बिजली की श्रेष्ठ लता के समान चमकती हुई, और चमेली की सेज पर सुनहरी जूही की सुन्दर माला-सी दमकती हुई, हे राधे, क्षणभर के लिए भी मेरे नेत्रों को अपने दर्शन से आनंदित करो!
प्रेम-क्रीड़ा की सेज पर उनके साथ बिना किसी क्रम के ढेरों प्रेम-भरी बातें करती हुई, पहले आलिंगन में मानो दोनों देह एक होती हुई, हे राधे, क्षणभर के लिए भी मेरे नेत्रों को अपने दर्शन से आनंदित करो!
प्रेम के आनंद-भरे युद्ध से थककर अपने श्याम प्रियतम के चौड़े, बहुत सुख देने वाले वक्षस्थल की सेज पर सोती हुई, इस प्रेम-रस से विशाखा को आनंदित करती हुई, सचमुच समृद्ध जीवन वाली हे राधे, क्षणभर के लिए भी मेरे नेत्रों को अपने दर्शन से आनंदित करो!
आह, प्रेम-मिलन के अंत में, परिपक्व सौभाग्य के गर्व से फूली हुई, जिस घनिष्ठ मित्रता को तुम प्रिय मानती हो उसके बड़े गर्व से मतवाली होकर, धीमे वचनों से मुकुन्द से अपने आभूषण और सेज सजवाती हुई, हे राधे, क्षणभर के लिए भी मेरे नेत्रों को अपने दर्शन से आनंदित करो!
कामदेव के प्रिय कुंज के आँगन में, बनावटी टेढ़ेपन का आडंबर दिखाकर व्रज के नवयुवराज का उपहास करती हुई, और स्तुति करती सखियों के बीच सभा में उनकी उपेक्षा करती हुई, हे राधे, क्षणभर के लिए भी मेरे नेत्रों को अपने दर्शन से आनंदित करो!
और कभी संयोग से हुई कृष्ण की किसी छोटी-सी भूल पर अचानक मान करके मौन हो जाती हुई, जबकि वे चतुर, मीठी मनुहार भरी बातों से तुम्हारी कृपा माँगते हैं, हे राधे, क्षणभर के लिए भी मेरे नेत्रों को अपने दर्शन से आनंदित करो!
तुम अपने पिता वृषभानु का साक्षात सौभाग्य हो, और बकासुर के शत्रु के साथ प्रेम के वन में घूमने वाली भ्रमरी हो। हे देवी, अपनी सखियों रूपी कुमुदिनियों के लिए तुम चाँदनी हो। हा करुणा-सागर! हे राधे, क्षणभर के लिए भी मेरे नेत्रों को अपने दर्शन से आनंदित करो!
हे गुणों के असीम सागर, भद्रसेन आदि साथियों की मित्र, अनुपम गुणों वाली प्रेयसियों की शिरोमणि! हे करुणा से भीगी कोमल हृदय वाली, दुःख के महासागर में डूबते इस जन की ओर देखो। हे राधे, क्षणभर के लिए भी मेरे नेत्रों को अपने दर्शन से आनंदित करो!
जो, श्रेष्ठ सूत्रधार की भाँति, आनंद को उभारते हुए, 'प्रेम-पूर' नामक इस रस-भरे दशक के रंगमंच पर अपनी जिह्वा-रूपी नर्तकी को नृत्य कराता है, वह तुरंत ही उस रत्न-सम दिव्य युगल की कृपा पाता है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- रघुनाथ दास गोस्वामी · जीवनी पढ़ें
- पद
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