रध हरिर् अपि पुलकि वसन्तम्
राधा और कृष्ण का दिव्य आनन्द पूरी तरह खिल उठा है, और वे वसन्त राग में गीत गा रहे हैं।
एक कोयल देर तक पंचम स्वर में कूकती है। राधा और कृष्ण उसका अनुकरण करते हुए हर दिशा में गा उठते हैं।
राधा और कृष्ण एक भौंरे की महिमा गाते हैं, जो एकान्त में वासन्ती फूल का मधु पी रहा है। वे उसकी गुंजार की नकल करते हुए गाते हैं।
जब राधा और कृष्ण गाते हैं, तब उनके होंठ आपस में मिल जाते हैं। इस तरह वे सबसे मधुर रस का आस्वादन करते हैं।
राधा और कृष्ण मलय पर्वत से आती उस अत्यन्त सुगन्धित वायु की महिमा गाते हैं, जो धीरे-धीरे लँगड़ाती हुई चल रही है।
राधा और कृष्ण दूर से आता सुन्दर वाद्य-संगीत सुनते हैं। उनके नेत्रों के कोने उस संगीत के ताल पर आनन्द से नाच रहे हैं।
राधा और कृष्ण की कान्ति वर्षा-ऋतु के बादल और बिजली जैसी है, और वह मोरों को नचा देती है।
टिप्पणी: मोरों को वर्षा-ऋतु प्रिय होती है, और वे उल्लास से नाचकर अपना आनन्द प्रकट करते हैं। उन्होंने राधा और कृष्ण को बादल और बिजली समझा, इसलिए उन्हें देखकर स्वाभाविक रूप से आनन्द से नाच उठे।
गोपियाँ आकाश को सुगन्धित चूर्ण की अनन्त बौछार से भर देती हैं।
पसीने की बूँदों और रंगीन, सुगन्धित चूर्ण से ढके हुए राधा और कृष्ण अत्यन्त सुन्दर शोभा पा रहे हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- जीव गोस्वामी · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- गोपाल-चम्पू
- पद
- 9