Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

रध हरिर् अपि पुलकि वसन्तम्

टेक
राधा हरिर् अपि पुलकि-वसन्तम् गायति निज-मुदम् अनु विकसन्तम्
अर्थ

राधा और कृष्ण का दिव्य आनन्द पूरी तरह खिल उठा है, और वे वसन्त राग में गीत गा रहे हैं।

उपदिशते दिशि दिशि गुणयन्तम् पिकम् अनु पञ्चमम् अति-चिरयन्तम्
अर्थ

एक कोयल देर तक पंचम स्वर में कूकती है। राधा और कृष्ण उसका अनुकरण करते हुए हर दिशा में गा उठते हैं।

वसन्ती-मधु रहसि धयन्तम् शंसति मधुलिहम् अनु गयन्तम्
अर्थ

राधा और कृष्ण एक भौंरे की महिमा गाते हैं, जो एकान्त में वासन्ती फूल का मधु पी रहा है। वे उसकी गुंजार की नकल करते हुए गाते हैं।

मधु-रसम् अनु गनं रमयन्तम् रसयति विनिमितम् अधरम् अयन्तम्
अर्थ

जब राधा और कृष्ण गाते हैं, तब उनके होंठ आपस में मिल जाते हैं। इस तरह वे सबसे मधुर रस का आस्वादन करते हैं।

मलयज-सुरभि-धुरं खञ्जन्तम् कवयति गन्ध-वहं प्रसजन्तम्
अर्थ

राधा और कृष्ण मलय पर्वत से आती उस अत्यन्त सुगन्धित वायु की महिमा गाते हैं, जो धीरे-धीरे लँगड़ाती हुई चल रही है।

वद्य-गणं गुण-वलित-दिग्-अन्तम् अनु नृत्यति मद-लोल-दृग्-अन्तम्
अर्थ

राधा और कृष्ण दूर से आता सुन्दर वाद्य-संगीत सुनते हैं। उनके नेत्रों के कोने उस संगीत के ताल पर आनन्द से नाच रहे हैं।

चपल-घन-सम-रुचिम् अनु तं तं नटयति शिखि-गणम् अपि निपतन्तम्
अर्थ

राधा और कृष्ण की कान्ति वर्षा-ऋतु के बादल और बिजली जैसी है, और वह मोरों को नचा देती है।

टिप्पणी: मोरों को वर्षा-ऋतु प्रिय होती है, और वे उल्लास से नाचकर अपना आनन्द प्रकट करते हैं। उन्होंने राधा और कृष्ण को बादल और बिजली समझा, इसलिए उन्हें देखकर स्वाभाविक रूप से आनन्द से नाच उठे।

किरति चुर्णम् अनु पुर्ण-दनन्तम् समम् अली-ललनभिर् अनन्तम्
अर्थ

गोपियाँ आकाश को सुगन्धित चूर्ण की अनन्त बौछार से भर देती हैं।

श्रमजल-कण-गणम् अनु विलसन्तम् वहति परग-भरं रुचिमन्तम्
अर्थ

पसीने की बूँदों और रंगीन, सुगन्धित चूर्ण से ढके हुए राधा और कृष्ण अत्यन्त सुन्दर शोभा पा रहे हैं।

इस भजन के बारे में

पद
9