राधे! मधु पान छले कत ये खेलिबे
हे राधे! मधु-पान के बहाने आप वंशीधारी को साथ लेकर कितने ही खेल खेलेंगी। उस सुख में सब सखियाँ मग्न होंगी, और आनन्द बहुत बढ़ जाएगा।
सूर्य के मन्दिर में जाकर आप बड़े यत्न से सूर्य-रूप हरि की पूजा करेंगी। विरोधियों को चकमा देकर हम सब सुख से रहेंगी, और राई आनन्द में मतवाली हो जाएँगी।
दिन ढलता देखकर तब मैं अपने घर लौटूँगी। हम सब प्रसन्न मन से कृष्ण-नाम गाती हुई चलेंगी।
कृष्ण सब गौओं और ग्वालों को इकट्ठा करके, मुरली की तान छेड़ते हुए, खेलते-खेलते दादा बलराम के साथ गोष्ठ की ओर जाएँगे।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- सेवा लालसा
- भाव
- पद
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