राधे! यावटे श्री रत्न मन्दिर माझे
हे राधे! यावट में, रत्नों के मन्दिर के बीच, एक बड़ा पलंग शोभा पा रहा है और उस पर अति मनोहर शय्या है। जब अरुणोदय होगा, तब मैं आपको लेकर उस सुन्दर पलंग पर सुला दूँगी।
रात की बात कोई नहीं छेड़ता; दूसरों के जानने से क्या लाभ? सखियों का यही भाव है। सब अपने-अपने घर जाएँगी, तब यह दासी भी सो जाएगी। पौर्णमासी व्याकुल रहेंगी।
कुंज-लीला छिपी रहेगी और सब सोते रहेंगे। सुबह जब सूर्य उगेगा, तब यह दासी विधि के अनुसार उठकर घर बुहारने आदि के काम करेगी और सारे वस्त्र सँभालकर रखेगी।
कुंज-लीला की स्मृति के रस में, प्रेम के वश डूबकर, मैं "हा राधे! हा राधे!" पुकारूँगी। देह बेसुध हो जाएगी, और मेरे मन को कोई नहीं समझ पाएगा। फिर मैं आपकी नींद तोड़ूँगी।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- सेवा लालसा
- भाव
- पद
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