रमते रमं परितः कृष्णः
जब सखा बहुत से गीत गाते हैं, तब कृष्ण बड़ी उत्सुकता से बलराम के साथ खेलते हैं।
वे भौंरों और कोयलों की तरह गाते हैं। वे हंसों और तोतों की तरह बोलते हैं।
इसी तरह वे चक्रवाक, चकोर, बक और दूसरे पक्षियों की बोली की नकल करते हैं। उनसे विवाद करते हुए वे खिलखिलाकर हँस पड़ते हैं।
बाघ की तरह दहाड़कर वे गायों और बालकों को डरा देते हैं।
वे प्रतिदिन, बिना चूके, सभी पक्षियों, हिरनों और दूसरे पशुओं से बातें करते थे। वे उन्हें नाम लेकर पुकारते थे।
यदि उनका कोई सखा इधर-उधर भटककर दूर चला जाता है, तो वे प्रेम से हँसते हुए उसे खींचकर वापस ले आते हैं।
दूर चली गई गाय को वे उसका नाम लेकर पुकारते हैं। उनकी पुकार का मधुर स्वर गायों और ग्वाल-बालों को आनन्दित कर देता है।
जब वे गाय को पुकारते हैं, तब सारे मोर भी बड़े कोलाहल के साथ अपनी बोली में उत्तर देते हैं।
अपने भाई का हाथ अपने हाथ में लेकर वे हँसते हैं और अपने सखाओं की प्रशंसा करते हैं।
सखाओं के साथ अपने पूज्य बड़े भाई को लिटाकर विश्राम कराते हुए वे उनके चरण दबाते हैं।
वे पत्तों की सुन्दर शय्या पर लेटते हैं और अपना सिर एक सखा की गोद में रखकर विश्राम करते हैं।
खेल की थकान से वे विश्राम करने के लिए लेट जाते हैं। परम पवित्र सन्तजन उनके शरीर पर पंखा झलते हैं।
वहाँ कुछ ग्वाल-बाल उनके चरण दबाते हैं। ये सेवक हमारे भीतर भी उन जैसा बनने की इच्छा जगाते हैं।
अपने स्नेही सखाओं के गीतों से प्रसन्न होकर वे सो गए।
हम इन लीलाओं का सदा स्मरण करते रहें। हमारा हृदय किसी और बात का चिन्तन सह नहीं सकता।
हम कौन होते हैं जो इन बातों की लालसा करें? ये तो श्रील शुकदेव गोस्वामी और उनके साथ अनेक दूसरे परम सौभाग्यशाली सन्तों की अभिलाषाएँ हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- जीव गोस्वामी · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- गोपाल-चम्पू
- पद
- 16