रम्य तिलक नव तुलसी दल भर वन मलति विकसी
कृष्ण सुन्दर तिलक और नई तुलसी-दलों तथा वन के फूलों की मालाओं से शोभायमान हैं। बाँसुरी बजाते हुए वे उन भौंरों की गुंजार के साथ स्वर मिलाते हैं, जो उनके दिव्य रूप की मधुर सुगन्ध से मतवाले हो गए हैं।
हंसों और सारसों का एक विशाल झुंड उनके पीछे चला और उन्हें चारों ओर से घेर लिया। पक्षियों का कलरव कृष्ण की बाँसुरी की ध्वनि के साथ मिलकर एक मधुर सुर-मेल बन गया।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- जीव गोस्वामी · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- गोपाल-चम्पू
- पद
- 2