सखि दम् पत्योर् अनयोर् युगलम्
सखी, तुम्हें इस दिव्य युगल की कोई भी बात याद नहीं है।
रात में भौंरा कमल के फूलों को छोड़ देता है। वह उनके बीच क्रीड़ा नहीं करेगा।
दिन में कमल के फूल चारों दिशाओं में शोभा पाते हैं, पर रात में वे अपनी पंखुड़ियाँ बन्द कर लेते हैं। वे चमकते तारों का अनुसरण करने से इनकार कर देते हैं।
सूर्यदेव का सारथी, प्रभात, अब आ गया है। फिर भी कमल के फूल उसे देखने के लिए अपनी आँखें थोड़ी-सी भी नहीं खोलते।
अब तारे अपनी शोभा छोड़ रहे हैं। अब दिव्य युगल अपनी शोभा के साथ हमारे सामने प्रकट हो रहे हैं।
अपना मौन छोड़कर पक्षी गा रहे हैं।
व्रज का गाँव दही मथने की आवाज से गूँज रहा है। फिर भी कोई दिव्य युगल की लीलाओं के बारे में कुछ नहीं बताता।
कवि ऊँचे स्वर में गाता है। सूर्य भी उसे किसी और विषय पर गाने के लिए नहीं ले जाता।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- जीव गोस्वामी · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- गोपाल-चम्पू
- पद
- 8