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“जय राधा माधव” के परिणाम

536 भजन · 902 पद भजन के शब्दों में · 608 पद अर्थ में

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3 पद भजन में

रूप गोस्वामी

  • पद 15भजन
    अथ वनमाली वर-विपिनाली-
    कुञ्ज-निकेतन-वीक्षण-शाली
    जयति विहारी निशि मणि-हारी
    व्रज-तरुणी-गण-मानस-हारी
  • पद 16भजन
    नत-जन-बन्धो जय रस-सिन्धो
    वदनोल्लसित-श्रम-जल-बिन्दो
    त्वम् अखिल-देवावलि-कृत-सेवा-
    सन्ततिर् अधमा वयम् इह के वा
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  • पद 17भजन
    जय जय कुण्डल-युग-रुचि-मण्डल-
    वृत-गण्ड-स्थल दमिताखण्डल
    धृत-गोवर्धन गोकुल-वर्धन
    देहि रतिं मे त्वयि मुर-मर्दन
1 पद भजन में 14

आदि शंकराचार्य · वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 6भजन
    पर-ब्रह्मापीडः कुवलय-दलोत्फुल्ल-नयनो
    निवासी नीलाद्रौ निहित-चरणो 'नन्त-शिरसि
    रसानन्दो राधा-सरस-वपुर्-आलिङ्गन-सुखो
    जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे
1 पद भजन में 7

भगवान ब्रह्मा · वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 15भजन
    आनन्द-चिन्मय-रसात्मतया मनःसु
    यः प्राणिनां प्रतिफलन् स्मरताम् उपेत्य
    लीलायितेन भुवनानि जयत्य् अजस्रम्
    गोविन्दम् आदि-पुरुषं तम् अहं भजामि
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में 3

वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    दीव्यद्-वृन्दारण्य-कल्प-द्रुमाधः
    श्रीमद्-रत्नागार-सिंहासन-स्थौ
    श्रीमद्-राधा-श्रील-गोविन्द-देवौ
    प्रेष्ठालीभिः सेव्यमानौ स्मरामि
  • पद 1अर्थ
    वृन्दावन के वन में कल्पवृक्ष के नीचे, रत्नों से जड़े मंदिर में, श्री श्री राधा-गोविन्द अपनी अति प्रिय सखियों द्वारा सेवित होकर तेजोमय सिंहासन पर विराजमान हैं। मैं उन दोनों को सादर प्रणाम करता हूँ।
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में 3

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतावली

  • पद 1भजन
    …(भजन बिना गति नाइ रे)
    (भज) ब्रज-बने राधा कृष्ण-चरणारबिन्द
    (ज्ञान-कर्म परिहरि' रे)
    (भज) (ब्रज-बने राधा कृष्ण)
  • पद 1अर्थ
    भज, भज रे मेरे मन, तू अत्यन्त मन्द है! (भजन के बिना जीवन का लक्ष्य प्राप्त नहीं होगा।) (भज) व्रज के वनों में श्रीश्री राधा-कृष्ण के चरण-कमलों को! (अरे! ज्ञान और कर्म को त्याग दे।) (भज) (व्रज-वन में श्रीश्री राधा-कृष्ण को)
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में 3

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतावली

  • पद 2भजन
    एक-बार बोलो रसना उच्चैः-स्वरे
    (बोलो) नन्देर नन्दन जशोदा-जीबन
    श्री-राधा-रमण प्रेम-भरे
  • पद 2अर्थ
    एक बार ऊँचे स्वर में अपनी जिह्वा से प्रेमपूर्वक कहो, 'नंद-नंदन! यशोदा-जीवन! श्री राधा-रमण!'
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में 3

वैष्णव आचार्यों के और भजन

  • पद 3भजन
    राधा जिनकि जाया है, अद्भुत जिनकी माया है
    ऐसे श्री घन-श्याम को (मेरे) बारम्बार प्रणाम् है
  • पद 3अर्थ
    जिनकी प्रियतमा राधा हैं और जिनकी माया अत्यन्त अद्भुत है, ऐसे घनश्याम को, जिनका तेजोमय वर्ण ताजे बादल के समान है, मैं बार-बार अपना सादर प्रणाम करता हूँ।
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में 3

वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    वन्दे 'हं श्री-गुरोः श्री-युत-पद-कमलं श्री-गुरुन् वैष्णवांश् च
    श्री-रूपं साग्रजातं सह-गण-रघुनाथान्वितं तं स जीवम्
    साद्वैतं सावधूतं परिजन-सहितं कृष्ण-चैतन्य-देवं
    श्री-राधा-कृष्ण-पादान् सह-गण-ललिता- श्री-विशाखान्वितांश् च
  • पद 1अर्थ
    …में उनके समस्त भक्तों को सादर प्रणाम करता हूँ। तत्पश्चात मैं भगवान श्री कृष्ण, श्रीमती राधारानी और ललिता-विशाखा के नेतृत्व में समस्त गोपियों के चरणकमलों को सादर प्रणाम करता हूँ।…
1 पद भजन में 2 पद अर्थ में 1

नरोत्तम दास ठाकुर · प्रार्थना

  • पद 1भजन
    लोकनाथ प्रभु ! तुमि दया कर मोरे
    राधा-कृष्ण-चरण जेन सदा चित्ते स्फुरे
  • पद 1अर्थ
    हे लोकनाथ प्रभु! मुझ पर कृपा करो, जिससे राधा-कृष्ण के चरण मेरे चित्त में सदा जागृत रहें।
  • पद 3अर्थ
    गोपियों में जो सबसे श्रेष्ठ हैं, उन श्रीमती राधारानी के चरणों में, कब तुम मुझे सेवा हेतु समर्पित करोगे?
2 पद भजन में 1 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतमाला

  • पद 2भजन
    श्री रूप मञ्जरी सङ्गे जबो कबे
    रस-सेबा-शिखा-तरे
    तद्-अनुग हो'ये राधा-कुण्ड-तटे
    रोहिबे हर्षितान्तरे
  • पद 4भजन
    परम आनन्दे सकले मिलिया
    राधिका चरणे रब
    एइ पराकाष्ठ सिद्धि कबे हबे
    पाबो राधा-पदासब
  • पद 2अर्थ
    श्री रूप-मंजरी मुझे रस और सेवा की शिक्षा कब देंगी? कब मैं उनकी अनुगामिनी बनकर हर्षित हृदय से राधा-कुण्ड के तट पर उनके साथ निवास करूँगी?
4 पद अर्थ में

नरोत्तम दास ठाकुर · प्रेम-भक्ति-चन्द्रिका

  • पद 3अर्थ
    तुंगविद्या और इन्दुरेखा, ये आठ सखियाँ प्रमुख सखियाँ कहलाती हैं। ये श्री राधिका की सबसे प्रिय सहचरियाँ हैं और सदा गहरे प्रेम से राधा-कृष्ण की सेवा करती हैं। ये राधा-कृष्ण से अत्यंत घनिष्ठ रूप से जुड़ी हैं।
  • पद 4अर्थ
    …को यहाँ न गिनो। मैं केवल अधिक स्नेह वाली (अधिक-स्नेहा) सखियों का वर्णन करता हूँ। वे सदा राधा-कृष्ण के साथ रहती हैं और कृष्ण-कथा तथा उनकी लीला के आनन्द में डूबी रहती हैं। इन सभी को नर्म-सखी कहा जाता है।…
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  • पद 6अर्थ
    इन सखियों का अनुगमन करते हुए मैं उनसे प्रेम-सेवा की भिक्षा माँगूँगा और उनके संकेत से ही सारी सेवाएँ समझ लूँगा। राधा-कृष्ण के रूप और गुणों से मैं सदा मोहित और अनुरक्त रहूँगा, और सखियों के बीच निवास करूँगा।
  • पद 7अर्थ
    वृन्दावन में राधा-कृष्ण दोनों के चारों ओर सखियाँ रहती हैं और समय पर आनंदपूर्वक सेवा करती हैं। सखी का संकेत मिलने पर मैं चामर डुलाऊँगा और उनके चन्द्रमुख में ताम्बूल दूँगा।
2 पद भजन में 1 पद अर्थ में

रूप गोस्वामी

  • पद 2भजन
    चरित्रं तन्वानः प्रियम् अघवद्-आह्लादन-पदं
    जयोद्घोषैः सम्यग्-विरचित-शची-शोक-हरणः
    उदञ्चन्-मार्तण्ड-द्युति-हर-दुकूलाञ्चित-कटिः
    स देवश् चैतन्याकृतिर् अतितरां नः कृपयतु
  • पद 4भजन
    अनारढ्यः प्रीत्या चिरम् असुर-भाव-प्रणयिणं
    प्रपन्नानां दैवीं प्रकृतिम् अधिदैवं त्रि-जगति
    अजस्रं यः श्रीमान् जयति सहजानन्द-मधुरः
    स देवश् चैतन्याकृतिर् अतितरां नः कृपयतु
  • पद 2अर्थ
    पापियों को भी प्रिय लगने वाली लीलाएँ करते हुए, जो 'जय' की गूँजती ध्वनियों से माता शची का शोक पूर्णतः हर लेते हैं, जिनकी कमर उगते सूर्य की-सी कान्ति वाले वस्त्र से लिपटी है, चैतन्य-स्वरूप वे भगवान हम पर अपनी कृपा भरपूर बरसाएँ।
1 पद अर्थ में 6

श्री चैतन्य महाप्रभु · वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1अर्थ
    श्री-कृष्ण-संकीर्तन की जय हो, जो हृदय पर वर्षों से जमी सारी धूल को धो देता है और बद्ध जीवन की, अर्थात् बार-बार जन्म-मृत्यु की महाभयंकर अग्नि को शान्त कर देता है। यह संकीर्तन आन्दोलन समस्त मानवता के लिए परम मंगलमय है, क्योंकि यह कल्याणकारी चन्द्रमा की किरणें…
2 पद अर्थ में 3

वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 2अर्थ
    मैं श्री वार्षभानवी-देवी-दयित दास [श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती का ही एक नाम] को प्रणाम करता हूँ, जो श्रीमती राधारानी के प्रियतम श्री कृष्ण के दास हैं, जो कृपा के सागर हैं, और जो कृष्ण के साथ सम्बन्ध के दिव्य विज्ञान को प्रदान करने वाले गुरु हैं।
  • पद 3अर्थ
    हे प्रभु! मैं आपको प्रणाम करता हूँ, जो श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा-शक्ति के साक्षात् स्वरूप हैं। श्रील रूप गोस्वामी के अनुगामी होकर आप उस भक्ति को प्रदान करते हैं, जो राधा-कृष्ण के उज्ज्वल माधुर्य-प्रेम से समृद्ध है।
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में 2

नरोत्तम दास ठाकुर · प्रार्थना

  • पद 1भजन
    हरि हरि! कबे मोर हैबे सुदिन
    भजिब श्री-राधा-कृष्ण हञा प्रेमाधीन
  • पद 1अर्थ
    हरि हरि! मेरा वह शुभ दिन कब आएगा, जब मैं प्रेम में विवश होकर श्री राधा-कृष्ण की सेवा करूँगा?
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में 2

वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    हे कृष्ण करुणा-सिन्धो
    दीन-बन्धो जगत्-पते
    गोपेश गोपिका-कान्त
    राधा-कान्त नमो 'स्तु ते
  • पद 1अर्थ
    हे प्रिय कृष्ण, करुणा के सागर! आप दीनों के बन्धु और सृष्टि के मूल स्रोत हैं। आप गोपों के स्वामी और गोपियों के, विशेषतः राधारानी के, प्रियतम हैं। मैं आपको सादर प्रणाम करता हूँ।