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“हरे कृष्ण” के परिणाम

558 भजन · 980 पद भजन के शब्दों में · 802 पद अर्थ में

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1 पद भजन में 1 पद अर्थ में 5

भक्तिविनोद ठाकुर · शरणागति

  • पद 2भजन
    निताइ, गौराङ्ग, अद्वैत, श्रीवास,
    गदाधर,—पञ्च-जन
    कृष्ण-नाम-रसे, भासा’बे जगत्,
    कोरि’ महा-सङ्कीर्तन
  • पद 2अर्थ
    नित्यानन्द प्रभु, गौरांग महाप्रभु, अद्वैत प्रभु, श्रीवास ठाकुर और गदाधर पंडित, ये पाँच महापुरुष महासंकीर्तन करते हुए सारे जगत को कृष्ण-नाम के रस में सराबोर कर देंगे।
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में 5

नरोत्तम दास ठाकुर · प्रार्थना

  • पद 4भजन
    मो-बड अधम जने कर कृपा निरीक्षणे
    दास करि राख वृन्दाबने
    श्रि-कृष्ण चैतन्य नाम प्रभु मोर गौर-धाम
    नरोत्तम लैल शरणे
  • पद 4अर्थ
    मुझ जैसे पतित जन पर कृपा-दृष्टि डालिए। मुझे अपना सेवक बनाकर वृन्दावन में रहने दीजिए। स्वर्ण-वर्ण श्री कृष्ण चैतन्य ही मेरे स्वामी हैं। नरोत्तम दास उनकी ही शरण लेते हैं।
1 पद भजन में 2 पद अर्थ में 3

श्री क्षणदा-गीत-चिन्तामणि

  • पद 4भजन
    आनन्द-कन्द गौरचन्द्र
    अकिञ्चने बड दया
    कृष्ण-दास करत आश
    ओ पद-पङ्कज-छाया
  • पद 1अर्थ
    प्रेमोल्लास से अभिभूत होकर गौर प्रभु नृत्य करते हैं। एक क्षण वे 'हरि!' कहकर पुकारते हैं। दूसरे क्षण वे वृन्दावन के स्मरण में मग्न हो जाते हैं। क्षण-क्षण वे श्री राधा का भाव धारण करते हैं, जो कृष्ण के प्राणों की स्वामिनी हैं।
  • पद 4अर्थ
    गौरचंद्र प्रभु समस्त आनंद के मूल हैं। जिन भक्तों के पास उनके अतिरिक्त कोई धन नहीं है, उन पर वे अत्यंत दयालु हैं। कृष्णदास उनके चरण-कमलों की छाया पाने के लिए तरसते हैं।
3 पद भजन में 1

रघुनाथ दास गोस्वामी

  • पद 2भजन
    न धर्मम्- नाधर्मम्- श्रुति-गण-निरुक्तम्- किल कुरु
    व्रजे राधा-कृष्ण-प्रचुर-परिचर्याम् इह तनुः
    शची-सूनुम्- नन्दीश्वर-पति-सुतत्वे गुरु-वरं
    मुकुन्द-प्रेष्ठत्वे स्मर पदम् अजस्रम्- ननु मनः
  • पद 4भजन
    असद्-वार्ता-वेष्या विसृज मति-सर्वस्व-हरणीः
    कथा मुक्ति-व्याघ्र्या न शृणु किल सर्वात्म-गिलणीः
    अपि त्यक्त्वा लक्ष्मी-पति-रतिम् इतो व्योम-नयनीं
    व्रजे राधा-कृष्णौ स्व-रति-मणि-दौ त्वम्- भज मनः
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  • पद 12भजन
    मनः-शिक्षा-दैकादशक-वरम् एतम्- मधुरया
    गिरा गायत्य् उच्चैः समधि-गत-सर्वार्थ-तति यः
    स-यूथः श्री-रूपानुग इह भवन् गोकुल-वने
    जनो राधा-कृष्णातुल-भजन-रत्नम्- स लभते
3 पद भजन में 1

सार्वभौम भट्टाचार्य

  • पद 1भजन
    हुहुङ्कार-गर्जनादि अहो-रात्र-सद्-गुणं
    हा कृष्ण राधिका-नाथ प्रार्थनादि-भावनम्
    धूप-दीप-कस्तुरी च चन्द्रनादि-लेपनं
    सीता-नाथाद्वैत-चरणारविन्द-भावनम्
  • पद 2भजन
    गङ्गा वारि मनो हारि तुलस्यादि मञ्जरी
    कृष्ण-ज्ञान सदा ध्यान प्रेम-वारि झर्झरी
    कृपाब्धिः करुणा-नाथ भविष्यति प्रार्थनं
    सीता-नाथाद्वैत-चरणारविन्द-भावनम्
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  • पद 3भजन
    मुहुर् मुहुः कृष्ण कृष्ण उच्चैः स्वरे गायतं
    अहे नाथ जग त्रातः मम दृष्टि-गोचरम्
    द्विभुज करुणा-नाथ दीयतां सुदर्शनं
    सीता-नाथाद्वैत-चरणारविन्द-भावनम्
2 पद भजन में 2 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतावली

  • पद 2भजन
    जय हरि कृष्ण राम जग-जन-सु-बिश्राम
    सर्ब-जन-मानस-रञ्जन
    मुनि-बृन्द निरन्तर जे नामेर समादर
    कोरि' गाय भोरिया बदन
  • पद 3भजन
    ओहे कृष्ण-नामखर तुमि सर्ब-शक्ति-धर
    जीबेर कल्याण-बितरणे
    तोमा बिना भब-सिन्धु उद्धारिते नाहि बन्धु
    आसियाछो जीब-उद्धरणे
  • पद 2अर्थ
    "हे हरि! हे कृष्ण! हे राम! हे जगत के लोगों की शरण! हे हर हृदय के आनन्द! आपकी जय हो!" ऋषिगण मुँह भरकर इसी प्रकार नाम की उपासना और स्तुति करते हैं।
  • पद 3अर्थ
    हे कृष्ण-नाम के अक्षरों, जीवों का कल्याण करने के लिए आपमें सारी शक्ति है। आपके सिवा भव-सागर से उद्धार करने वाला कोई मित्र नहीं है। आप जीवों का उद्धार करने ही आए हैं।
2 पद भजन में 2 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतावली

  • पद 2भजन
    बाचक स्वरूप तब श्री-कृष्णादि नाम
    बर्ण-रूपी सर्ब-जीब-आनन्द-बिश्राम
  • पद 6भजन
    कृष्णे अपराधी जदि नामे श्रद्धा कोरि'
    प्राण भोरि' डाके नाम राम कृष्ण हरि
  • पद 2अर्थ
    "वाचक" आपके अनेक नामों को कहते हैं, जिनमें श्री कृष्ण नाम सबसे प्रमुख है। विभिन्न अक्षरों से बने ये नाम सभी जीवों को आनन्द और सुख देते हैं।
  • पद 6अर्थ
    यदि कृष्ण के प्रति अपराध करने वाला कोई व्यक्ति श्रद्धा से जीवन भर भगवान के नाम, जैसे राम, कृष्ण और हरि, पुकारता रहे,...
2 पद भजन में 2 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतावली

  • पद 4भजन
    जे धोरिलो राधा-पद परम जतने
    से पाइलो कृष्ण-पद अमूल्य-रतने
  • पद 5भजन
    राधा-पद बिना कभु कृष्ण नाहि मिले
    राधार दासीर कृष्ण सर्ब-बेदे बोले
  • पद 3अर्थ
    श्री राधा उज्ज्वल-रस की आचार्या हैं। अब हम श्री राधा-कृष्ण के शुद्ध प्रेम के विषय पर विचार करेंगे।
  • पद 5अर्थ
    श्री राधा के चरणों की शरण के बिना कृष्ण कभी नहीं मिलते। सभी वेद कहते हैं कि कृष्ण तो राधा की दासियों के ही हैं।
2 पद भजन में 2 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · कल्याण-कल्पतरु

  • पद 2भजन
    आमार बचन धरो अन्तर बिशुद्ध कोरो
    कृष्णामृत सदा कोरो पान
    जीबन सहजे जाय भक्ति-बाधा नाहि पाय
    तद्-उपाय कोरोहो सन्धान
  • पद 7भजन
    बैष्णबेर परिचोय अबश्यक नाहि होय
    आडम्बरे कभु नाहि जाओ
    बिनोदेर निबेदन राधा-कृष्ण-गुण-गान
    फुकारि' फुकारि' सदा गाओ
  • पद 2अर्थ
    मेरी बात मान, अपने अन्तर को शुद्ध कर। सदा कृष्ण-अमृत का पान कर। जीवन को सहज रूप से चलने दे, ताकि भक्ति में कोई बाधा न आए। इसी का उपाय खोज।
  • पद 7अर्थ
    वैष्णव होने का बाहरी परिचय आवश्यक नहीं है। कभी दिखावे में मत पड़। भक्तिविनोद की यही विनती है: सदा ऊँचे स्वर में पुकार-पुकारकर राधा-कृष्ण के गुणों का गान करते रहो।
2 पद भजन में 2 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · कल्याण-कल्पतरु

  • पद 3भजन
    शास्त्रे फल-श्रुति जत सेइ लोभे कोतो शत
    मूढ-जन भोग प्रति धाय
    से सब कैतब जानि' छारिया बैष्णब-ज्ञानी
    मुख्य-फल कृष्ण-रति पाय
  • पद 5भजन
    अत एब स्पृहा-द्वोय छारि' शोध ए हृदोय
    नाहि राखो कामेर बासना
    भोग-मोख नाहि चाइ श्री-कृष्ण-चरण पाइ
    बिनोदेर एइ तो' साधन
  • पद 3अर्थ
    शास्त्रों में बताए गए फलों को सुनकर, उनके लोभ में न जाने कितने सैकड़ों मूर्ख लोग भोग की ओर दौड़ते हैं। पर ज्ञानी वैष्णव इन सबको छलावा जानकर त्याग देता है, और कृष्ण-प्रेम रूपी मुख्य फल पाता है।
  • पद 5अर्थ
    इसलिए इन दोनों इच्छाओं को त्यागकर इस हृदय को शुद्ध करो। इसमें काम की वासना मत रखो। मुझे भोग और मुक्ति नहीं चाहिए, मुझे तो केवल श्री कृष्ण के चरण चाहिए। यही भक्तिविनोद की साधना है।
2 पद भजन में 2 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · कल्याण-कल्पतरु

  • पद 2भजन
    श्री-गुरु-चरणामृत-माध्वीक-सेबने
    मत्त हो'ये कृष्ण-गुण गाबो बृन्दाबने
  • पद 3भजन
    कर्मी ज्ञानी कृष्ण-द्वेषी बहिर्मुख-जन
    घृणा कोरि' अकिञ्चने कोरिबे बर्जन
  • पद 2अर्थ
    श्रीगुरु के चरणामृत रूपी मधु का सेवन करके, उन्मत्त होकर, वृन्दावन में कृष्ण के गुणों का गान कब करूँगा?
  • पद 3अर्थ
    कब यह दीन व्यक्ति घृणा करके कर्मियों, ज्ञानियों, कृष्ण-द्वेषियों और बहिर्मुख जनों का त्याग करेगा?
2 पद भजन में 2 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · कल्याण-कल्पतरु

  • पद 3भजन
    ताहार निकटे श्री-ललिता-कुण्ड
    रत्न-बेदी कोत शत
    जथा राधा-कृष्ण लीला बिस्तारिया
    बिहारेन अबिरत
  • पद 5भजन
    मालतीर माला गान्थिया आनिबो
    दिबे तबे शखि-कोरे
    राधा-कृष्ण-गले सखी पराइबे
    नाचिबो आनन्द-भोरे
  • पद 3अर्थ
    उसके निकट श्री ललिता-कुंड है, जिसके चारों ओर सैकड़ों रत्न-जटित वेदियाँ हैं, जहाँ राधा-कृष्ण निरंतर अपनी लीलाओं का विस्तार करते हुए विहार करते हैं।
  • पद 5अर्थ
    मालती के फूलों की माला गूँथकर मैं लाऊँगी, फिर उसे किसी सखी के हाथ में दे दूँगी। जब वह सखी उस माला को राधा-कृष्ण के गले में पहनाएगी, तब मैं आनंद से भरकर नृत्य करूँगी।
2 पद भजन में 2 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतमाला

  • पद 2भजन
    ज्ञान कर्म देब देबि बहु जतनेते सेबि'
    प्राप्त-फल होइलो तुच्छ ज्ञान
    साधु-जन-सङ्गाबेशे श्री-कृष्ण-कथार शेषे
    बिश्वासो तो' होय बलबान्
  • पद 5भजन
    कृष्ण-भक्ति चिन्तामणि तँर स्पर्शे लौह-खनि
    कार्म-ज्ञान-गत श्रद्धा-भाब
    हय जय हेम-भर छाडिया तो' कु-बिकार
    से केबल मणिर प्रभाब
  • पद 2अर्थ
    कर्म और ज्ञान से बड़े प्रयास करके देवी-देवताओं की सेवा करने पर भी तुच्छ फल और तुच्छ निर्विशेष विचार ही हाथ लगते हैं। परन्तु साधुजनों की संगति में रहकर कृष्ण-कथा सुनने से भगवान् में दृढ़ विश्वास जागृत होता है।
  • पद 5अर्थ
    कृष्ण-भक्ति ही वह चिन्तामणि है। उसके स्पर्श से कर्म और ज्ञान में लगी हुई श्रद्धा का लोहा, भक्ति में श्रद्धा के सोने में बदल जाता है। यह शक्ति केवल भक्ति के इस चिन्तामणि में ही है।
2 पद भजन में 2 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतमाला

  • पद 1भजन
    छाडि' अन्य अभिलाष ज्ञान-कर्म-सहाबास
    आनुकूल्य कृष्णानुशीलन
    शुद्ध-भक्ति बोलि' तारे भक्ति-शास्त्र सु-बिचारे
    श्री-रूपेर सिद्धान्त-बचन
  • पद 3भजन
    साधन-भक्तिर बले भाब-रूप भक्ति-फले
    ताहा पुनः प्रेम-रूप पाय
    प्रेमे जीब कृष्ण भजे कृष्ण-भक्ति-रसे माजे
    सेइ रस श्री-रूप शिखाय
  • पद 1अर्थ
    अन्य समस्त कामनाओं को, तथा ज्ञान और कर्म के संग को त्यागकर, भगवान् कृष्ण के अनुकूल जो साधना की जाती है, उसे ही शुद्ध भक्ति कहा जाता है। भक्ति-शास्त्रों का गहन अध्ययन करने के बाद श्रील रूप गोस्वामी ने यही सिद्धान्त प्रस्तुत किया है।
  • पद 3अर्थ
    साधन-भक्ति के बल से भाव-भक्ति का फल मिलता है, और वही भाव आगे प्रेम का रूप ले लेता है। प्रेम से जीव कृष्ण का भजन करता है और कृष्ण-भक्ति के रस में डूब जाता है। यही रस श्रील रूप गोस्वामी सिखाते हैं।
2 पद भजन में 2 पद अर्थ में

नरोत्तम दास ठाकुर · प्रार्थना

  • पद 1भजन
    हरि हरि! कि मोर करम गति मन्द
    ब्रजे राधा-कृष्ण पद ना सेविनु तिल-आध
    ना भूझिनू रागेर सम्बन्ध
  • पद 3भजन
    कृष्णदास कविराज रसिक भकत-माझ
    जे रचिल चैतन्य-चरित
    गौर-गोविन्द-लीला शुनिले गलये शिला
    ना डूविल ताहे मोर चित
  • पद 1अर्थ
    हे हरि, हे हरि! मेरे कर्मों की गति कितनी मंद है! मैंने व्रज में राधा-कृष्ण के चरणों की सेवा एक पल के लिए भी नहीं की, और राग के इस संबंध को कभी नहीं समझा।
  • पद 3अर्थ
    भक्तों में कृष्णदास कविराज रस के बड़े रसिक हैं, जिन्होंने चैतन्य-चरित लिखा। गौर और गोविन्द की लीला सुनकर पत्थर भी पिघल जाते हैं, फिर भी मेरा मन उसमें नहीं डूबा।
2 पद भजन में 2 पद अर्थ में

भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर

  • पद 3भजन
    कृष्ण-कथा छाड़ि' जिह्वा आन कथा कहे
    प्रजल्पी ताहार नाम वृथा वाक्य कहे
  • पद 5भजन
    कृष्ण-भक्त-सङ्ग विने अन्य-सङ्गे रत
    जन-सङ्गी कु-विषय-विलासे विव्रत
  • पद 3अर्थ
    जिसकी जिह्वा कृष्ण-कथा त्यागकर अन्य बातें करती है, वह व्यर्थ वचन बोलने वाला "प्रजल्पी" कहलाता है।
  • पद 5अर्थ
    जो कृष्ण-भक्तों के संग के बजाय अन्य लोगों के संग में रमा रहता है, कुविषयों के भोग-विलास में लीन रहता है, वह "जन-संगी" कहलाता है।
2 पद भजन में 2 पद अर्थ में

  • पद 2भजन
    जय राधे जय राधे राधे जय राधे जय श्री राधे
    जय कृष्ण जय कृष्ण कृष्ण जय कृष्ण जय श्री कृष्ण
  • पद 3भजन
    जय राधे जय राधे जय राधे जय राधे
    जय कृष्ण जय कृष्ण जय कृष्ण जय कृष्ण
  • पद 2अर्थ
    जय राधे जय राधे राधे जय राधे जय श्री राधे! जय कृष्ण जय कृष्ण कृष्ण जय कृष्ण जय श्री कृष्ण!
  • पद 3अर्थ
    जय राधे जय राधे जय राधे जय राधे! जय कृष्ण जय कृष्ण जय कृष्ण जय कृष्ण!
2 पद अर्थ में 6

नरोत्तम दास ठाकुर · प्रार्थना

  • पद 2अर्थ
    कब मैं ललिता, विशाखा और सभी सखियों के साथ मंडली बनाकर राधा-कृष्ण से मिलूँगा? राई और कानु एक-दूसरे का हाथ पकड़कर घूम-घूमकर नाचेंगे, और मैं उन्हें निहारते हुए आनंद में समय बिताऊँगा।
  • पद 3अर्थ
    नृत्य-लीला के पूर्ण होने पर, राधा-कृष्ण गोवर्धन पर्वत की एक कुटिया में विश्राम करेंगे। नरोत्तम दास कहते हैं: मैं प्रार्थना करता हूँ कि सदा उन दोनों के चरणों की सेवा कर सकूँ।
2 पद भजन में 3

स्वरूप दामोदर गोस्वामी

  • पद 1भजन
    स्व-भक्ति-योग-लासिनं सदा व्रजे विहारिणम्
    हरि-प्रिया-गणाग्रगं शचीसुत-प्रियेश्वरम्
    सराध-कृष्ण-सेवन-प्रकाशकं महाशयं
    भजाम्य् अहं गदाधरं सुपण्डितं गुरुं प्रभुम्
  • पद 3भजन
    शचीसुताङ्घ्रि-सार-भक्त-वृन्द-वन्द्य-गौरवं
    गौर-भाव-चित्त-पद्म-मध्य-कृष्ण-वल्लभम्
    मुकुन्द-गौर-रूपिणं स्वभाव-धर्म-दायकं
    भजाम्य् अहं गदाधरं सुपण्डितं गुरुं प्रभुम्
3 पद भजन में

मीराबाई · वैष्णव आचार्यों के और भजन

  • पद 1भजन
    नव-अरुण-सम
    जागो हृदोये मम
    सुन्दर गिरिधारी-लाल्
    माधव कृष्ण गोपाल्
  • पद 2भजन
    …जागो जागो तुमि किशोर श्यामल्
    श्री राधा-प्रियतम जागो हृदोये मम
    जागो हे घोष्तेर् राखाल्
    माधव कृष्ण गोपाल्
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  • पद 3भजन
    …प्राणेर् देवता एसो हे किशोर्
    लोये राधा बामे हृदि ब्रज धामे
    एसो हे ब्रजेर् राखाल्
    माधव कृष्ण गोपाल्