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“जय राधा माधव” के परिणाम

536 भजन · 902 पद भजन के शब्दों में · 608 पद अर्थ में

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3 पद अर्थ में

स्तवामृत-लहरी

  • पद 1अर्थ
    श्रीमती राधारानी ने कहा: प्रियतम, स्वप्न में मैंने यहाँ यमुना जैसा एक नदी-तट देखा। वहाँ वृन्दावन की तरह बहुत से कुशल नर्तक थे। मृदंग और तरह-तरह के बाजे थे। वहाँ बिजली जैसा उज्ज्वल एक ब्राह्मण-रत्न था, जो सारे जगत को प्रेम के सागर में डाल रहा था।
  • पद 5अर्थ
    अपनी प्रियतमा से यह कहकर मुस्कुराते हुए प्रियतम कृष्ण ने अपनी कौस्तुभ मणि को छुआ। प्रभु का मन समझकर वह मणि चमक उठी और उसने वही सब लीलाएँ तथा वे सब चर-अचर प्राणी दिखा दिए, जिन्हें राधा ने स्वप्न में देखा था।
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  • पद 6अर्थ
    श्रीमती राधारानी ने क्षणभर विचार करने के बाद कहा: प्रियतम, अब मैं जान गई कि आपके हृदय में क्या है, जिसके कारण आप मुस्कुरा रहे हैं। आप ही वे हैं। आपने जो कहा और जो सोचा, वह अब मुझे स्पष्ट हो गया है, इसलिए मुझे लगता है कि मैं भी वही हूँ।
2 पद भजन में

श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 7भजन
    ननी-चोरा नाम राखे यतेक गोपिनी
    केलेसोणा नाम राखे राधा-बिनोदिनी
  • पद 36भजन
    अष्टोत्तर-शत नाम ये करे पठन
    अनायासे पाय राधा-कृष्णेर चरण
2 पद भजन में

सनातन गोस्वामी · कृष्ण-लीला-स्तव

  • पद 3भजन
    क्रीडा-संप्राप्त-भण्डीर
    जय भण्डीर-मण्डन
    गोप-रूपि-प्रलम्ब-ज्ण
    द्वन्द्व-क्रीडा-प्रवर्तक
  • पद 4भजन
    वाह्य-वाहक-केलिमन्
    जय ष्रीदाम-वाहक
    बल-पातित-दुर्धर्ष
    प्रलम्ब बल-वत्सल
2 पद भजन में

सनातन गोस्वामी · कृष्ण-लीला-स्तव

  • पद 1भजन
    यज्ण-पत्नी-प्रसदार्थ
    गोप-क्षुद्-आतिवर्धन
    क्सुद्-अर्त-गोप-वाग्-व्यँर
    जय यज्वान्न-याचक
  • पद 3भजन
    ब्राह्मणी-ताप-भिच्-चित्र
    वेषावस्थान-भुषण
    जय द्विज-सती-ष्लाघिन्
    यज्ण-पत्नीष्ट-दास्यक
2 पद भजन में

सनातन गोस्वामी · कृष्ण-लीला-स्तव

  • पद 1भजन
    जय गोपी-गणान्विष्ट
    वृक्ष-संपृष्ट-दर्षन
    तुलसी-मलती-मल्ली
    यूथिका-पृष्ट-वीक्षाण
  • पद 3भजन
    उन्मत्ती-कृत-गोप्य्-ओघ
    गोपिकानुकृतेहित
    जय गोपी-गणान्विष्ट
    स्वभावपित-गोपिक
2 पद भजन में

सनातन गोस्वामी · कृष्ण-लीला-स्तव

  • पद 1भजन
    अत्य्-उच्च-गोपिका-दुःख
    रोदनोन्मथितेन्द्रिय
    जय गोपी-पुनर्-दृष्ट
    स्मायमान-मुखाम्बुज
  • पद 4भजन
    गोपी-चेलाण्चलासीन
    गोपी-गण-सभाजित
    जय गोपी-सदो-जता
    धिक-ष्री-राजमान हे
2 पद भजन में

सनातन गोस्वामी · कृष्ण-लीला-स्तव

  • पद 1भजन
    जयाम्बिक-वन-प्राप्त
    सारस्वत-जलाप्लुत
    निज-पादाम्बुज-स्पृष्ट
    नन्द-ग्राहि-महोरग
  • पद 2भजन
    विदाधरेन्द्र-षाप-घ्न
    जय नन्द-विमुक्ति-द
    ष्राविताहि-पुरावृत्त
    सुदर्षन-विमोचन
2 पद भजन में

सनातन गोस्वामी · कृष्ण-लीला-स्तव

  • पद 1भजन
    जय गोकुल-सन्त्रासि
    केषि-विक्षेपण प्रभो
    हयासुर-महास्यान्तः
    प्रवेषित-महा-भुज
  • पद 2भजन
    हेलाहत-महा-दैत्य
    जय केषि-निसूदन
    केषवं केषि-मथनं
    वन्दे त्वां देवतार्चितम्
2 पद भजन में

सनातन गोस्वामी · कृष्ण-लीला-स्तव

  • पद 2भजन
    स्त्री-गणोद्गीत-महिम
    व्रज-स्त्री-स्तुति-हर्षित
    पितृ-मातृ-महार्ति-ज्ण
    जय चाणूर-मर्दन
  • पद 5भजन
    भूमि-पतित-भोजेन्द्र
    कंसोपरि-विकूर्दित
    कंस-ध्वंसन कंसारे
    जय कंस-निसूदन
3 पद अर्थ में

गोविन्द दास कविराज

  • पद 5अर्थ
    यह सुनकर राधा उठ खड़ी हुईं और बोलीं, 'मैं इस योगी के पास जाऊँगी।' जटिला ने कहा, 'निःसंशय रह, उनके दर्शन मात्र से ही बड़ा लाभ होगा।'
  • पद 6अर्थ
    गेहूँ के आटे से भरी थाली और घी से भरे स्वर्ण-पात्र को जोड़े हाथों में लेकर राधा पास आते हुए पुकार उठीं, और उन्हें देखते ही उनका हृदय काँप उठा।
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  • पद 8अर्थ
    यह सुनते ही राधा ने आँचल से अपना मुख ढक लिया, क्योंकि वह वेष धारण किए स्वयं नटराज ही थे। गोविन्द दास कहते हैं कि अभिनेताओं में शिरोमणि उन्होंने इस प्रकार अपने हृदय का प्रयोजन सिद्ध किया और वहाँ से चले गए।
2 पद भजन में

वृन्दावन दास ठाकुर

  • पद 2भजन
    राधार माधुरी अनङ्ग मञ्जरी निताइ नितु से सेवे
    कोटि शशधर वदन सुन्दर सखा सखी बलदेवे
  • पद 3भजन
    राधार भगिनी श्यामसोहागिनी सब सखीगण प्राण
    जाँहार लाबरी मण्डप साजनी श्री मणि मन्दिर नाम
2 पद भजन में

सनातन गोस्वामी · कृष्ण-लीला-स्तव

  • पद 3भजन
    क्रीडा-सम्प्राप्त-भाण्डीर जय भाण्डीर-मण्डन
    गोप-रूपि-प्रलम्बज्ञ द्वन्द्व-क्रीडा-प्रवर्तक
  • पद 4भजन
    बाह्य-वाहक-केलिमन् जय श्रीदाम-वाहक
    बल-पातित-दुर्धर्ष-प्रलम्ब बल-वत्सल
2 पद भजन में

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतावली

  • पद 1भजन
    योग-पीठोपरि-स्थित, अष्ट-सखी-सुवेष्टित,
    बृन्दारण्ये कदम्ब-कानने
    राधा-सह वंशी-धारी, विश्व-जन-चित्त-हारी,
    प्राण मोर ताँहार चरणे
  • पद 6भजन
    राधा-कृष्ण प्राण मोर जीवने मरणे
    मोरे राखि’ मारि’ सुखे थाकुक दु’जने
2 पद भजन में

रूप गोस्वामी

  • पद 2भजन
    प्रियः सो ’यं कृष्णः सह-चरि कुरु-क्षेत्र-मिलितस्
    तथाहं सा राधा तद् इदम् उभयोः सङ्गम-सुखम्
    तथाप्य् अन्तः-खेलन्-मधुर-मुरली-पञ्चम-जुषे
    मनो मे कालिन्दी-पुलिन-विपिनाय स्पृहयति
  • पद 5भजन
    बलाद् अक्ष्णोर् लक्ष्मीः कवलयति नव्यं कुवलयं
    मुखोल्लासः फुल्लं कमल-वनम् उल्लङ्घयति च
    दशां कष्टाम् अष्टापदम् अपि नयत्य् आङ्गिक-रुचिर्
    विचित्रं राधायाः किम् अपि किल रूपं विलसति
1 पद अर्थ में 3

श्री क्षणदा-गीत-चिन्तामणि

  • पद 1अर्थ
    प्रेमोल्लास से अभिभूत होकर गौर प्रभु नृत्य करते हैं। एक क्षण वे 'हरि!' कहकर पुकारते हैं। दूसरे क्षण वे वृन्दावन के स्मरण में मग्न हो जाते हैं। क्षण-क्षण वे श्री राधा का भाव धारण करते हैं, जो कृष्ण के प्राणों की स्वामिनी हैं।
1 पद भजन में 2

रघुनाथ दास गोस्वामी

  • पद 9भजन
    निज-जन-युत-राधा-कृष्ण-मैत्री-रसाक्त
    व्रज-नर-पशु-पक्षि-व्रात-सौख्यैक-दातः
    अगणित-करुणत्वान् मं उरी-कृत्य तान्तं
    निज-निकट-निवासं देहि गोवर्धन त्वम्
1 पद भजन में 2

आदि शंकराचार्य

  • पद 9भजन
    गोविन्दाष्टकमेतदधीते गोविन्दार्पित चेता यो
    गोविन्दाच्युत माधव विष्णो गोकुलनायक कृष्णेति
    गोविन्दाङ्घ्रिसरोजध्यानसुधाजलधौतसमस्ताघो
    गोविन्दं परमानन्दामृतमन्तःस्थं स तमभ्येति
2 पद अर्थ में 1

  • पद 1अर्थ
    श्याम के व्रज छोड़ जाने से कमल-सी सुंदर राधारानी इतनी दुःखी हैं कि वे निरंतर रोती रहती हैं।
  • पद 2अर्थ
    वन-कुंज को जंगली फूलों से सजाते हुए राधारानी कह उठती हैं, हे प्रिय सखी! श्याम नहीं आएँगे, यह सोचकर मैं सारी रात जागकर रोती रहती हूँ। वे अब व्रज में नहीं हैं!