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“गौर आरती” के परिणाम

439 भजन · 566 पद भजन के शब्दों में · 472 पद अर्थ में

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1 पद भजन में

जीव गोस्वामी · गोपाल-चम्पू

  • पद 4भजन
    पैत्र-विमोषक-जैत्र-विदोषक-पशि-भय-भ्रम-नशि-जय-क्रमसन्तत-गो-कुल सन्तत-गोकुल-दर्शनय युत दर्शन-संस्तुतनग-सुदर्शन-भग-सुदर्शन रत्न-निपतन-यत्न-निघतन-तक्षित-यक्षक रक्षित-पक्षक तर्जद्-अरिष्टद-गर्जद्-अरिष्टदवेशित-सद्-भुज-केशि-तनु-रुज कंसक-मरण-शंसक-करण-सङ्गत तत्-पुर-रङ्गततः पुर एव वपुर्-हर देववद्-अम्बरसद्-वर-वयक-सद्-वर-दयक मलि-सुदमक-पलि-सुधमककुब्जि-वपुः-सदृग्-उब्जित-तद-धृग्-अङ्ग तद्-अर्पित-सङ्गत-कल्पित-चन्दन-रुषित-वन्दन-तुषित पृष्ठ-मख-स्थल सृष्ट-मह-बल
    खण्डित-चपक दण्डित-शपक सङ्ग-परदिम रङ्ग-पदग्रिम-हस्ति-पदरक हस्तिप-मरक अंसग-दन्तक कंस-सद्-अन्तक-मल्ल-जन-क्रथ तल्लजम् उत्प्रथ मरित-कंसक तरित-शंसकप्रज्यदयहुक रज्यदयहुक जङ्गत यदव-सङ्गत-मधव-युक्ततयसजद्-उक्त-चयद् व्रज-यपित-ततक धपित-शतक-तन्-निजत-प्रथ सद्-द्विजत-व्रत-गौरव-भुमत गौरव-भु-गत-शस्त्र-कथञ्चित शस्त्र-कलञ्चित पञ्च-जनदर-सञ्चय-सुन्दरधर्म-नृपर्चित-शर्म-कृतञ्चित कल-वशं गुरु-बल-वपुः पुरुदक्षिनयन्न् अथ दक्षिण-सत्-पथ-सद्म-समगत सद्म-समयत-लोचन-बन्धुर-रोचन सन्धुर संस्मृत-गो-व्रज-सम्भृत-सुग्-व्रजतत्-प्रहितोद्धव तत्-प्रहितोद्धव-तच्-छ्रुत-शन्तिक सम्प्लुत-कन्तिक
    दुत-समगम-भुत-शमशम-मगधयोधन-सवध-रोधन
1 पद भजन में

रूप गोस्वामी

  • पद 3भजन
    लास्योल्लसद्-भुजग-शत्रु-पतत्र-चित्र-पट्ट्
    आंशुकाभरण-कञ्चुलिकाञ्चिताङ्गीम्
    गोरोचना-रुचि-विगर्हण-गौरिमाणं
    देवीं गुणैः सुललितां ललितां नमामि
1 पद भजन में

रघुनाथ दास गोस्वामी

  • पद 1भजन
    गौरीम् गोष्ठवनेश्वरीम् गिरिधर-प्राणाधिक-प्रेयसीम्
    स्वीय-प्राण-परार्ध-पुष्प-पटली-निर्मञ्छ्य-तत्-पद्धतिम्
    प्रेम्णा प्राण-वयस्यया ललितया संलालिताम् नर्मभिः
    सिक्ताम् सुष्ठु विशाखया भज मनो राधाम् अगाधाम् रसैः
1 पद भजन में

  • पद 1भजन
    तप्त-काञ्चन-गौराङ्गि
    राधे वृन्दावनेश्वरि
    वृषभानु-सुते देवि
    प्रणमामि हरि-प्रिये
1 पद भजन में

रघुनाथ दास गोस्वामी

  • पद 4भजन
    ज्योत्स्नामोक्षण-माल्य-हार-सुमनो-गौरी-बलारि-ध्वज
    गान्धर्वादि-सरांसि निर्झर-गिरिः शृङ्गार-सिंहासनम्
    गोपालो 'पि हरि-स्थलं हरिर् अपि स्फूर्जन्ति यत्-सर्वतः
    कस् तं गो-मृग-पक्षि-वृक्ष-ललितं गोवर्धनं नाश्रयेत्
1 पद भजन में

नरोत्तम दास ठाकुर · प्रार्थना

  • पद 3भजन
    जोखोन गौर नित्यानन्द, अद्वैतादि भक्त वृन्द,
    नदीया नगरे अवतार
    तोखोन ना होइलो जन्म, एबे देहे किबा कर्म,
    मिछा मात्र बोहि फिरि भार