- पद 2भजनयमुना-जल-लीनाण्ग
कालिन्दी-केलिलोलित
यमुना-तीर-सण्चारिन्
कृष्णा-कुण्ज-रति-प्रिय
“हरे कृष्ण” के परिणाम
558 भजन · 980 पद भजन के शब्दों में · 802 पद अर्थ में
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- पद 4भजनष्री-कृष्ण-चरनाम्भोज
प्रेमामृत-महाम्बुधे
नमस् ते दीन-दीनं मां
कदाचित् किं स्मरिष्यसि
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- पद 1भजनष्री-कृष्ण तव कारुण्य
महिम्ने मे नमो नमः
यो मां नीचं दुराचारं
नित्य-पाप-रतं षठम्
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- पद 1भजनएतल् लीला-स्तवं नाम
स्तोत्रं ष्री-कृष्ण तारकम्
प्रणामाष्ठोत्तर-सते
यो `र्थावगम-पूर्वकम्
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- पद 3भजनकृष्ण यारे कृपा करि उपदेश देन
तिनि त अर्जुन सम भाग्यवान हन
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- पद 4भजनमोह धेखि’ कृष्ण ताँ’र करिल निन्दन
अतएव अर्जुन कैल शिष्ह्यत्व ग्रहण
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- पद 3भजनपुछिल श्री कृष्णलीला वृन्दावन-माझ
ना भुजाल ता’रे तत्त्व वैष्णव-समाज
1 पद भजन में
- पद 2भजनवलयित-बाल्य-विलास जय बल-वलित हरे
1 पद भजन में
- पद 6भजनमं मतरम् अनु सुखम् उद्वितनु प्रततं सततं कृष्ण
द्रुतम् उररी-कुरु तनु-वृद्धिं पुरु-खेलवलि-कृत-तृष्ण
1 पद भजन में
- पद 4भजनभुज-भुजगेन हरेर् बहुधरचि हृदि तस्यः फन-लील
चक्रवक-युग-गीर्णि-रवकलि यत्र मुहुः कृत-शील
1 पद भजन में
- पद 2भजनकृष्णं कलयत मोहन-मन्त्रगम् एणीम् एणी-नयनम्
न यदि तद कथम् उभय-व्यक्तिं वीक्षे तद्-अपृथग्-अयनम्
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- पद 2भजननिज-नृपति-देहज-वचनम् उपसन्दिशन्
स तद्-उचित-चतुरीम् अमृतम् इव निर्विशन्
तम् अनु निजम् अययौ नगरम् इत-सम्मदः
अवदद् अपि तं हरेर् अभिगमन-सम्पदः
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- पद 2भजनहसंस् तु हरिर् उचे न चयम् अहिमंशुः
परं तु बत सत्रजिद् एष मणिजंशुः
तद् एतद् अवकर्ण्य प्रजस् तु गतवत्यः
स कृष्णम् अभि नगद् यथशु कृत-हत्यः
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- पद 1भजनअद्य समस्तं स-फलं जतम्
श्री-रधय विवहनम् इह यच् छ्री-कृष्णेन विभतम्
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- पद 7भजनतव चिकुर-कदम्बं स्तम्भते प्रेक्ष्य केकी
नयन-कमल-लक्ष्मीर् वन्दते कृष्णसारः
अलिर् अलम् अलकान्तं नौति पश्येति राधां
सु-मधुरम् अनुशंसन् भाति कुञ्जे-विहारी
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- पद 1भजनकपटम् इदं तव विन्दति हरे
नावसरं पुनर् आलि-निकरे ध्रुव
1 पद भजन में
- पद 1भजनइन्द्रनील-मणि-मञ्जुल-वर्णः
फुल्ल-नीप-कुसुमाञ्चित-कर्णः
कृष्णलाभिर् अकृशोरसि हारी
सुन्दरो जयति कुञ्ज-विहारी
1 पद भजन में
- पद 1भजनज्ञानी ज्ञान-योगे, कोरिया जतने,
ब्रह्मेर साक्षात् कोरे
ब्रह्म-साक्षात्कार, अप्रारब्ध कर्म,
सम्पूर्ण ज्ञानेते हरे
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- पद 2भजनगदाधर प्राणनाथ जाहे लागे ख्याति, गौरगत प्राण प्रेम के बुझिते पारे
क्षेत्र वास कृष्ण सेवा जार लागि छाड़े
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- पद 9भजनपठति सु-मतिर् एतद् दान-निर्वर्तनाख्यं
प्रथित-महिम-कुण्डस्याष्टकं यो यतात्मा
स च नियत-निवासं सुष्ठु संलभ्य काले
कलयति किल राधा-कृष्णयोर् दान-लीलाम्