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“हरे कृष्ण” के परिणाम

563 भजन · 985 पद भजन के शब्दों में · 803 पद अर्थ में

इनमें से कोई भी शब्द वाले भजन, सारे शब्दों वाले पहले। केवल सारे शब्दों वाले भजन

2 पद भजन में 2 पद अर्थ में 3

भक्तिविनोद ठाकुर · वैष्णव आचार्यों के और भजन

  • पद 1भजन
    पखि ना जानि कोन् अपराधे
    मुखे हरे कृष्ण नाम् बोलो ना
  • पद 3भजन
    पखि सकल् नाम् बोल्ते परो
    केनो हरे कृष्ण नाम् बोलो न
    केनो हरे कृष्ण नाम् हरि बोले मनो प्राण् काँदे ना
  • पद 1अर्थ
    मेरे मन की यह चिड़िया नहीं जानती कि किस अपराध के कारण उसके मुख से हरे कृष्ण नाम नहीं निकलता।
  • पद 3अर्थ
    पक्षी तो सभी नाम बोल सकता है, फिर मेरे मन की यह चिड़िया हरे कृष्ण नाम क्यों नहीं बोलती? हरे कृष्ण नाम बोलते हुए मेरा मन-प्राण क्यों नहीं रो उठता?
4 पद भजन में

जीव गोस्वामी · गोपाल-चम्पू

  • पद 1भजन
    रध-रक-शशधर मुरली-कर गोकुल-पति-कुल-पल जय जय कृष्ण हरे
    रध-बध-मोचन मुख-रोचन विदलित-गोकुल-कल जय जय कृष्ण हरे
  • पद 2भजन
    रध-परिकर-पुण्यद नैपुण्यद गोकुल-रुचिषु विशल जय जय कृष्ण हरे
    रध-सुकृत-वशी-कृत मङ्गल-भृत-तिलकित-गोकुल-भल जय जय कृष्ण हरे
इस भजन में 2 और मिलान दिखाएँ
  • पद 3भजन
    रध-निज-गति-धर्मद पुरु-शर्मद हत-गोकुल-रिपु-जल जय जय कृष्ण हरे
    रध-जीवन-जीवन गो-व्रज-धन गोकुल-सरसि-मरल जय जय कृष्ण हरे
  • पद 4भजन
    रध-मोद-रसकर सरसिज-वर गोकुल-मण्डल-नल जय जय कृष्ण हरे
    रध-भुषण भुषण गत-दुषण गोकुल-हृदिल-भु-पल जय जय कृष्ण हरे
1 पद भजन में 2 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतावली

  • पद 1भजन
    (हरे) हरये नमः कृष्ण जादबाय नमः
    जादबाय माधबाय केशबाय नमः
    गोपाल गोबिन्द राम श्री-मधुसूदन
    राधा-गोबिन्द बोलो (4 तिमेस्)
  • पद 1अर्थ
    (हरि!) भगवान हरि को प्रणाम! यदुवंशी भगवान कृष्ण को प्रणाम! भगवान कृष्ण को प्रणाम, जो लक्ष्मी के पति हैं, ब्रह्मा और शिव के स्वामी हैं, और यदुवंश में अवतरित हुए हैं! हे गोपाल! हे गोविन्द! हे राम! हे श्री मधुसूदन! बोलो, "राधा-गोविन्द!" (4 बार)
  • पद 3अर्थ
    अपना शरीर, घर और सब कुछ भगवान कृष्ण को समर्पित करो! बोलो, "राधा-गोविन्द!" (4 बार) अपने हृदय को सरल बनाकर अनन्य भाव से उनसे प्रेम करो! बोलो, "राधा-गोविन्द!" (4 बार)
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतावली

  • पद 1भजन
    कृष्ण गोबिन्द हरे
    गोपी-बल्लभ शौरे
  • पद 1अर्थ
    हे सर्वाकर्षक प्रभु (कृष्ण), हे गौओं, भूमि और इन्द्रियों को आनंद देने वाले प्रभु (गोविन्द), हे समस्त अशुभ को हरने वाले प्रभु (हरि), हे गोपियों के प्रियतम (गोपी-वल्लभ), हे शूरसेन के वंशज (शौरि)!
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में

जयदेव गोस्वामी

  • पद 8भजन
    हरिर् इति हरिर् इति जपति सकर्णम् (हरे कृष्ण हरे कृष्ण)
    विरह-विहित-मरणेव निकामम्
  • पद 1अर्थ
    राधा, हे कृष्ण! राधा! हे केशव, तुमसे बिछड़कर विरह में राधा की यह दशा है।
6 पद भजन में 5 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · शरणागति

  • पद 1भजन
    कृष्ण-नाम धरे कोतो बल्
    विषय-वासनानले, मोर चित्त सदा ज्वले,
    रवि-तप्त मरु-भूमि-सम्
    कर्न-रन्ध्र-पथ दिया, हृदि माझे प्रवेशिया, …
  • पद 4भजन
    कोरि' एतो उपद्रव, चित्ते वर्षे सुधा-द्रव,
    मोरे डारे प्रेमेर सागरे
    किछु ना बुझिते दिलो, मोरे तो’ बातुल कोइलो,
    मोर चित्त-वित्त सब हरे
  • पद 1अर्थ
    कृष्ण के नाम में कितनी शक्ति है? मेरा हृदय संसार-वासना की अग्नि में सदा जलता रहता है, जैसे सूर्य से तपा हुआ मरुस्थल। वह पवित्र नाम मेरे कानों के द्वारा हृदय में प्रवेश करके मेरी आत्मा पर अनुपम अमृत की वर्षा करता है।
  • पद 5अर्थ
    जिनकी मैंने शरण ली है, उनका व्यवहार ऐसा ही है। मैं यह सब वर्णन नहीं कर सकता। कृष्ण का नाम स्वतंत्र है और अपनी ही इच्छा से चलता है। जिस बात से वह सुखी हो, वही मेरे सुख का साधन है।
इस भजन में 7 और मिलान दिखाएँ
  • पद 5भजन
    लोइनु आश्रोय जा’र्, हेनो व्यवहार ता’र्,
    वर्निते ना पारि ए सकल्
    कृष्ण-नाम इच्छा-मोय्, जाहे जाहे सुखी होय्,
    सेइ मोर सुखेर सम्बल्
  • पद 6भजन
    प्रेमेर कलिका नाम्, अद्भुत रसेर धाम्,
    हेनो बल करये प्रकाश्
    ईषत् विकशि’ पुनः, देखाय् निज-रूप-गुन,
    चित्त हरि’ लोय कृष्ण-पाश्
  • पद 7भजन
    पूर्न विकशित होइया, ब्रजे मोरे जाय लोइया,
    देखाय् मोरे स्वरूप-विलास्
    मोरे सिद्ध-देह दिया, कृष्ण-पाशे राखे गिया,
    ए देहेर कोरे सर्व-नाश्
  • पद 8भजन
    कृष्ण-नाम-चिन्तामणि, अखिल रसेर खनि,
    नित्य-मुक्त शुद्ध-रस-मोय्
    नामेर बालाइ जत, सब लो’ये होइ हत,
    तबे मोर सुखेर उदोय्
  • पद 6अर्थ
    वह नाम प्रेम की कली और अद्भुत रस का धाम है। उसकी शक्ति ऐसी है कि थोड़ा-सा भी प्रकट होकर वह अपने ही स्वरूप और गुणों को दिखा देता है, मेरा चित्त हर लेता है और उसे कृष्ण के समीप ले जाता है।
  • पद 7अर्थ
    पूर्ण रूप से प्रकट होकर वह नाम मुझे व्रज में ले जाता है और अपनी दिव्य लीलाओं का दर्शन कराता है। वह मुझे मेरा अपना सिद्ध देह प्रदान करता है, मुझे कृष्ण के निकट रखता है और इस नाशवान शरीर का सर्वथा नाश कर देता है।
  • पद 8अर्थ
    कृष्ण का नाम चिन्तामणि है, समस्त दिव्य रसों की खान है, नित्य मुक्त और शुद्ध रस से पूर्ण है। जब नाम में आने वाली सभी बाधाएँ दूर होकर नष्ट हो जाएँगी, तभी मेरे सुख का सच्चा उदय होगा।
1 पद भजन में

गोविन्द दास · गौड़ीय वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 5भजन
    एहेन गौराङ्ग-गुण न करिनु श्रबण
    हय हय करि ह हुताश
    हरे-कृष्ण महा-मन्त्र मुख भरि ना ल-इलाम
    जीबन्-मृत गोबिन्द-दास
1 पद भजन में 9 पद अर्थ में

स्तवामृत-लहरी

  • पद 8भजन
    माथुरं विकुण्ठतो ‘पि जन्म-धाम दुर्लभं
    वासकाननं ततो ऽपि पाणिना धृतो गिरिः
    श्री-हरेस् ततो ऽपि यत् परं सरो ऽति-पावनं
    तत्र कृष्ण-कुण्ड एव संस्थितिः स्तुतास्तु नः
  • पद 1अर्थ
    कृष्ण-कुण्ड सबसे दुर्लभ तीर्थ है। उन लाखों नित्य तीर्थों ने कृष्ण को प्रसन्न करने और उनसे यहाँ निवास का वरदान पाने के लिए कौन-सी तपस्या की होगी? आओ, हम कृष्ण-कुण्ड में निवास की महिमा गाएँ।
  • पद 2अर्थ
    यदि अरिष्ट दैत्य भी इसमें प्रवेश पा सका, तो हम जैसे कुटिल हृदय वाले भी यहाँ निवास कर सकते हैं। आओ, हम उस कृष्ण-कुण्ड में निवास की महिमा गाएँ, जो मृत्यु के बहाने एक अद्भुत मुक्ति प्रदान करता है।
इस भजन में 7 और मिलान दिखाएँ
  • पद 3अर्थ
    जब राधा ने कहा, “गौ-वध (अरिष्टासुर-वध) के प्रायश्चित के लिए आपको तीनों लोकों के करोड़ों तीर्थों में स्नान करना होगा,” तब कृष्ण ने समस्त तीर्थों को बुलाकर अपनी एड़ी से उत्पन्न इस सरोवर में प्रसन्नतापूर्वक स्नान किया। आओ, हम कृष्ण-कुण्ड में निवास की महिमा गाएँ।
  • पद 4अर्थ
    कुछ तीर्थों में मनुष्य सब पापों से मुक्त होता है, कुछ में कर्म-बन्धन से छूटता है, कुछ में ब्रह्म-सुख मिलता है, और कुछ में विष्णुलोक का निवास मिलता है। आओ, हम उस कृष्ण-कुण्ड में निवास की महिमा गाएँ, जहाँ बिना किसी प्रयास के कृष्ण-प्रेम का रत्न मिल जाता है।
  • पद 5अर्थ
    जो आम, कदम्ब और अनेक माधवी लताओं के कुंजों से घिरा है, जहाँ चकवा, कोकिल और भ्रमरों का मधुर कलरव गूँजता है, और रात्रि में करोड़ों अकल्पनीय सुगन्धें फैली रहती हैं, आओ, हम उस कृष्ण-कुण्ड में निवास की महिमा गाएँ।
  • पद 6अर्थ
    यहाँ नवयौवन के वे दोनों शिरोमणि अपनी सखियों के साथ अनेक लीलाएँ करते थे। वे झूला झूलते, अद्भुत रास-नृत्य करते, गाते, बाजे बजाते और बातें करते थे। किसी एकान्त स्थान में उन्होंने उत्सुकता से फूलों के युद्ध का अमृत पिया। आओ, हम कृष्ण-कुण्ड में निवास की महिमा गाएँ।
  • पद 7अर्थ
    जिसके झिलमिलाते रत्न-तटों की सुन्दरता और उसकी छतरियों तथा चित्रित फर्शों की शोभा सभी नेत्रों को परम मंगलमय बना देती है, आओ, हम उस कृष्ण-कुण्ड में निवास की महिमा गाएँ।
  • पद 8अर्थ
    कृष्ण की जन्मभूमि मथुरा वैकुण्ठ से भी अधिक पवित्र और दुर्लभ है। उससे भी अधिक पवित्र वह वन है जहाँ वे रहे। उससे भी अधिक पवित्र वह पर्वत है जिसे उन्होंने अपने हाथ से उठाया। और उससे भी अधिक पवित्र है हरि का यह समीपवर्ती परम पावन सरोवर। आओ, हम कृष्ण-कुण्ड में…
  • पद 9अर्थ
    ये आठ श्लोक मन को कृष्ण-कुण्ड के तट पर रहने के लिए प्रेरित करते हैं। जो इनका पाठ करता है और अपने मन को श्री राधा-गिरिधारी के चरण-कमलों में डुबो देता है, उसे शीघ्र ही उनके प्रति सच्चा प्रेम प्राप्त हो।
5 पद भजन में 13

श्रीनिवास आचार्य · वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    कृष्णोत्कीर्तन-गान-नर्तन-परौ प्रेमामृताम्भो-निधी
    धीराधीर-जन-प्रियौ प्रिय-करौ निर्मत्सरौ पूजितौ
    श्री-चैतन्य-कृपा-भरौ भुवि भुवो भारावहन्तारकौ
    वन्दे रूप-सनातनौ रघु-युगौ श्री-जीव-गोपालकौ
  • पद 2भजन
    नाना-शास्त्र-विचारणैक-निपुणौ सद्-धर्म-संस्थापकौ
    लोकानां हित-कारिणौ त्रि-भुवने मान्यौ शरण्याकरौ
    राधा-कृष्ण-पदारविन्द-भजनानन्देन मत्तालिकौ
    वन्दे रूप-सनातनौ रघु-युगौ श्री-जीव-गोपालकौ
इस भजन में 3 और मिलान दिखाएँ
  • पद 5भजन
    कूजत्-कोकिल-हंस-सारस-गणाकीर्णे मयूराकुले
    नाना-रत्न-निबद्ध-मूल-विटप-श्री-युक्त-वृन्दावने
    राधा-कृष्णम् अहर्-निशं प्रभजतौ जीवार्थदौ यौ मुदा
    वन्दे रूप-सनातनौ रघु-युगौ श्री-जीव-गोपालकौ
  • पद 6भजन
    सङ्ख्या-पूर्वक-नाम-गान-नतिभिः कालावसानी-कृतौ
    निद्राहार-विहारकादि-विजितौ चात्यन्त-दीनौ च यौ
    राधा-कृष्ण-गुण-स्मृतेर् मधुरिमानन्देन सम्मोहितौ
    वन्दे रूप-सनातनौ रघु-युगौ श्री-जीव-गोपालकौ
  • पद 7भजन
    राधा-कुण्ड-तटे कलिन्द-तनया-तीरे च वंशीवटे
    प्रेमोन्माद-वशाद् अशेष-दशया ग्रस्तौ प्रमत्तौ सदा
    गायन्तौ च कदा हरेर् गुण-वरं भावाभिभूतौ मुदा
    वन्दे रूप-सनातनौ रघु-युगौ श्री-जीव-गोपालकौ
8 पद भजन में 6

जीव गोस्वामी · वैष्णव आचार्यों के और भजन

  • पद 1भजन
    कृष्ण-प्रेम-मयी राधा
    राधा प्रेम-मयो हरिः
    जीवने निधने नित्यं
    राधा-कृष्णौ गतिर् मम
  • पद 2भजन
    कृष्णस्य द्रविनं राधा
    राधाया द्रविनं हरिः
    जीवने निधने नित्यं
    राधा-कृष्णौ गतिर् मम
इस भजन में 6 और मिलान दिखाएँ
  • पद 3भजन
    कृष्ण-प्राण-मयी राधा
    राधा-प्राण-मयो हरिः
    जीवने निधने नित्यं
    राधा-कृष्णौ गतिर् मम
  • पद 4भजन
    कृष्ण-द्रव-मयी राधा
    राधा-द्रव-मयो हरिः
    जीवने निधने नित्यं
    राधा-कृष्णौ गतिर् मम
  • पद 5भजन
    कृष्ण-गेहे स्थिता राधा
    राधा-गेहे स्थितो हरिः
    जीवने निधने नित्यं
    राधा-कृष्णौ गतिर् मम
  • पद 6भजन
    कृष्ण-चित्त-स्थिता राधा
    राधा-चित्त-स्थितो हरिः
    जीवने निधने नित्यं
    राधा-कृष्णौ गतिर् मम
  • पद 7भजन
    नीलाम्बर-धरा राधा
    पीताम्बर-धरो हरिः
    जीवने निधने नित्यं
    राधा-कृष्णौ गतिर् मम
  • पद 8भजन
    वृन्दावनेश्वरी राधा
    कृष्णो वृन्दावनेश्वरः
    जीवने निधने नित्यं
    राधा-कृष्णौ गतिर् मम
9 पद भजन में

भक्तिविनोद ठाकुर

  • पद 1भजन
    श्री-कृष्ण-तत्त्व-निर्देशे कृपा यस्य प्रयोजनम्
    वन्दे तं ज्ञानदं कृष्ण-चैतन्यं रस-विग्रहम्
  • पद 4भजन
    आसीद् एकः परः कृष्णो नित्य-लीला-परायणः
    चिच्-छक्त्याविष्कृते धाम्नि नित्य-सिद्ध-गणाश्रिते
इस भजन में 7 और मिलान दिखाएँ
  • पद 8भजन
    ऐश्वर्य-कर्षिता एके नारायण-परायणाः
    माधुर्य-मोहिताश् चान्ये कृष्ण-दासाः सुनिर्मलाः
  • पद 13भजन
    यम् ऐश्वर्य-परा जीवा नारायणं वदन्ति हि
    माधुर्य-रस-सम्पन्नाः कृष्णम् एव भजन्ति तम्
  • पद 14भजन
    रस-भेद-वशाद् एको द्विधा भाति स्वरूपतः
    अद्वयः स परः कृष्णो विलासानन्द-चन्द्रमाः
  • पद 19भजन
    शान्त-भावस् तथा दास्यं सख्यं वात्सल्यम् एव च
    कान्त-भाव इति ज्ञेयाः सम्बन्धाः कृष्ण-जीवयोः
  • पद 25भजन
    शान्ता दासाः सखाश् चैव पितरो योषितस् तथा
    सर्वे ते सेवका ज्ञेयाः सेव्यः कृष्णः प्रियः सताम्
  • पद 31भजन
    जीवानां सिद्ध-सत्त्वानां नित्य-सिद्धिमताम् अपि
    एतन् नित्य-सुखं शश्वत् कृष्ण-दास्ये नियोजितम्
  • पद 34भजन
    यस्येह वर्तते प्रीतिः कृष्णे व्रज-विलासिनि
    तस्यैवात्म-समाधौ तु वैकुण्ठो लक्ष्यते स्वतः
5 पद भजन में 5 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · कल्याण-कल्पतरु

  • पद 1भजन
    शुनो हे रसिक-जन कृष्ण-गुण अगणन
    अनन्त कहिते नाहि पारे
    कृष्ण जगतेर गुरु कृष्ण बञ्छा-कल्प-तरु
    नाबिक से भब-पाराबारे
  • पद 2भजन
    हृदोय पीडित जा'र कृष्ण चिकित्सक ता'र
    भब-रोग नाशिते चतुर
    कृष्ण-बहिर्मुख-जने प्रेमामृत-बितरणे
    क्रमे लोय निज अन्तःपुर
  • पद 1अर्थ
    हे रसिक जनो, सुनो, कृष्ण के गुण अगणित हैं, अनन्त (शेष) भी उनका वर्णन नहीं कर पाते। कृष्ण जगत के गुरु हैं, कृष्ण मनोकामना पूरी करने वाले कल्पवृक्ष हैं, और वे ही भवसागर के नाविक हैं।
  • पद 2अर्थ
    जिसका हृदय पीड़ित है, कृष्ण ही उसके वैद्य हैं। वे भव-रोग को मिटाने में अत्यंत कुशल हैं। जो लोग कृष्ण से विमुख हो गए हैं, उन्हें भी वे प्रेमामृत बाँटते हैं, और धीरे-धीरे उन्हें अपने अंतःपुर में ले लेते हैं।
इस भजन में 6 और मिलान दिखाएँ
  • पद 3भजन
    कर्म-बन्ध ज्ञान-बन्ध आबेशे मानब अन्ध
    ता'र कृष्ण कोरुणा-सागर
    पद-पद्म-मधु दिया अन्ध-भाब घुचाइया
    चरणे कोरेन अनुचार
  • पद 4भजन
    बिधि-मार्ग-रत-जने स्वाधीनत-रत्न-दने
    राग-मार्गे कोरान प्रबेश
    राग-बश-वर्ती हो'ये पारकीय-भाबाश्रोये
    लभे जीब कृष्ण-प्रेमाबेश
  • पद 5भजन
    प्रेमामृत-बारि-धारा सदा पान-रत ताँर
    कृष्ण ताँहादेर बन्धु पति
    सेइ सब ब्रज-जन सु-कल्याण-निकेतन
    दीन-हीन-बिनोदेर गति
  • पद 3अर्थ
    कर्म और ज्ञान के बंधनों में मोहग्रस्त अंधे मानवों के लिए कृष्ण करुणा के सागर हैं। अपने चरण-कमलों का मधु देकर वे उनकी अंधता को दूर करते हैं, और उन्हें अपने चरणों का अनुचर बना लेते हैं।
  • पद 4अर्थ
    विधि-मार्ग में लगे भक्तों को कृष्ण स्वाधीनता का रत्न प्रदान करते हैं, और उन्हें राग-मार्ग में प्रवेश दिलाते हैं। प्रेम के वशीभूत होकर, पारकीय-भाव की शरण लेकर, वह जीव कृष्ण-प्रेम में पूर्णतः डूब जाता है।
  • पद 5अर्थ
    जो प्रेमामृत की धारा को सदा पीते रहते हैं, कृष्ण उनके बन्धु और पति बन जाते हैं। वे सभी व्रजवासी परम मंगल के धाम हैं, और वे ही इस दीन-हीन भक्तिविनोद की गति हैं।
8 पद भजन में

श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    भाद्र-कृष्ण-अष्टमीते देबकी-उदरे
    जन्मिलेन कृष्णचन्द्र श्री-मथुरा-पुरे
  • पद 3भजन
    वसुदेब थु-इल निया नन्द-घोषेर घरे
    नन्देर अलये कृष्ण दिन दिन बाडे
इस भजन में 6 और मिलान दिखाएँ
  • पद 9भजन
    अनन्त राखिल नाम अन्त ना पा-इया
    कृष्ण-नाम राखे गर्ग ध्यानेते जानिया
  • पद 29भजन
    अनन्त कृष्णेर नाम अनन्त महिमा
    नारदादि ब्यासदेब दिते नारे सीमा
  • पद 30भजन
    . नाम भज नाम चिन्त नाम कर सार
    अनन्त कृष्णेर नाम महिमा अपार
  • पद 31भजन
    शङ्ख-भरि सुबर्ण गो-कोटि करे दान
    तथापि ना हय कृष्ण-नामेर समान
  • पद 32भजन
    ये-इ नाम से-इ कृष्ण भज निष्ठा करि
    नामेर सहित आछेन आपनि श्री-हरि
  • पद 36भजन
    अष्टोत्तर-शत नाम ये करे पठन
    अनायासे पाय राधा-कृष्णेर चरण
7 पद भजन में

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतमाला

  • पद 1भजन
    धन जन देह गेह कृष्णे समर्पण
    कोरियाछो शुद्ध-चित्ते कोरोहो स्मरण
  • पद 2भजन
    तबे केनो मम सुत बोलि' कोरो दुःख
    कृष्ण निलो निज-जन ताहे तार सुख
इस भजन में 5 और मिलान दिखाएँ
  • पद 3भजन
    कृष्ण-इच्छा-मते सब घटय घटना
    ताहे सुख-दुःख-ज्ञान अबिद्या-कल्पना
  • पद 4भजन
    जाहा इच्छा कोरे कृष्ण ताइ जानो भाल
    त्यजिया आपन इच्छा घुचाओ जञ्जाल
  • पद 5भजन
    देय कृष्ण नेय कृष्ण पाले कृष्ण सबे
    राखे कृष्ण मारे कृष्ण इच्छा कोरे जबे
  • पद 6भजन
    कृष्ण-इच्छा बिपरीत जे कोरे बासना
    तार इच्छा नाहि फले से पाय जातना
  • पद 7भजन
    त्यजिया सकल शोक शुनो कृष्ण-नाम
    परम आनन्द पबे पूर्ण हबे काम
3 पद भजन में 3 पद अर्थ में 10

भक्तिविनोद ठाकुर · वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    'राधा-कृष्ण' बोल् बोल् बोलो रे सोबाइ
    (एइ) शिखा दिया, सब् नदीया
    फिर्छे नेचे' गौर-निताइ
    (मिछे) मायार् बोशे, जाच्छो भेसे', …
  • पद 2भजन
    (जीव्) कृष्ण-दास्, ए बिश्वास्,
    कोर्ले तो' आर् दुःखो नाइ
    (कृष्ण) बोल्बे जबे, पुलक् ह'बे
    झोर्बे आङ्खि, बोलि ताइ
  • पद 1अर्थ
    "राधा-कृष्ण" बोलो, बोलो, सब बोलो! यह शिक्षा देते हुए गौर-निताई सारे नदिया में नाचते हुए घूम रहे हैं। हे भाइयो, तुम व्यर्थ ही माया के वश में बहे जा रहे हो, कभी डूबते और कभी उभरते हुए।
  • पद 2अर्थ
    यदि तुम यह विश्वास कर लो कि जीव कृष्ण का नित्य दास है, तो फिर कोई दुःख शेष नहीं रहेगा। जब तुम कृष्ण का नाम बोलोगे, तो शरीर में रोमांच होगा और आँखों से अश्रु बहेंगे, यही मैं कहता हूँ।
इस भजन में 2 और मिलान दिखाएँ
  • पद 3भजन
    ('राधा) कृष्ण' बोलो, सङ्गे चलो,
    एइ-मात्र भिखा चाइ
    (जाय्) सकल्'बिपोद् भक्तिविनोद्
    बोले, जखोन् ओ-नाम् गाइ
  • पद 3अर्थ
    "राधा-कृष्ण" बोलो और साथ चलो, मेरी यही एक विनती है। भक्तिविनोद कहते हैं, "जब मैं यह नाम गाता हूँ, तो सारी विपदाएँ दूर हो जाती हैं।"
5 पद भजन में 8

कृष्णदास कविराज गोस्वामी · वैष्णव आचार्यों के और भजन

  • पद 2भजन
    कौरविन्द-कान्ति-निन्दि-चित्र-पट्ट-शाटिका
    कृष्ण-मत्त-भृङ्ग-केलि-फुल्ल-पुष्प-वाटिका
    कृष्ण-नित्य-सङ्गमार्थ-पद्म-बन्धु-राधिका
    मह्यम् आत्म-पाद-पद्म-दास्य-दास्तु राधिका
  • पद 6भजन
    नित्य-नव्य-रूप-केलि-कृष्ण-भाव-सम्पदा
    कृष्ण-राग-बन्ध-गोप-यौवतेषु कम्पदा
    कृष्ण-रूप-वेश-केलि-लग्न-सत्-समाधिका
    मह्यम् आत्म-पाद-पद्म-दास्य-दास्तु राधिका
इस भजन में 3 और मिलान दिखाएँ
  • पद 7भजन
    स्वेद-कम्प-कण्टकाश्रु-गद्गदादि-सञ्चिता
    मर्ष-हर्ष-वामतादि-भाव-भुषणाञ्चिता
    कृष्ण-नेत्र-तोषि-रत्न-मण्डनालि-दाधिका
    मह्यम् आत्म-पाद-पद्म-दास्य-दास्तु राधिका
  • पद 8भजन
    या क्षणार्ध-कृष्ण-विप्रयोग-सन्ततोदिता
    नेक-दैन्य-चापलादि-भाव-वृन्द-मोदिता
    यत्न-लब्ध-कृष्ण-सङ्ग-निर्गताखिलाधिका
    मह्यम् आत्म-पाद-पद्म-दास्य-दास्तु राधिका
  • पद 9भजन
    अष्टकेन यस् त्व् अनेन नौति कृष्ण-वल्लभां
    दर्शने 'पि शैलजादि-योषिदालि-दुर्लभाम्
    कृष्ण-सङ्ग-नन्दितात्म-दास्य-सीधु-भाजनं
    तं करोति नन्दितालि-सञ्चयाशु सा जनम्
4 पद भजन में 4 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर

  • पद 1भजन
    येषां रागोदितः कृष्णे श्रद्धा वा विमलोदिता
    तेषाम् आचरणं शुद्धं सर्वत्र परिदृश्यते
  • पद 9भजन
    ज्ञात्वैतद् व्रज-भावाढ्या वैकुण्ठ-स्थाः सदात्मनि
    भजन्ति सर्वदा कृष्णं सच्-चिद्-आनन्द-विग्रहम्
  • पद 1अर्थ
    जिनकी कृष्ण में श्रद्धा राग से उत्पन्न हो या विधिपूर्वक निर्मल भाव से उत्पन्न हुई हो, उनका आचरण सब ओर से शुद्ध ही दिखाई देता है।
  • पद 9अर्थ
    यह जानकर, व्रज-भाव से समृद्ध होकर, सदा अपने भीतर वैकुण्ठ में स्थित रहते हुए, वे सच्चिदानंद-स्वरूप कृष्ण की निरंतर भक्ति करते हैं।
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  • पद 12भजन
    सार-ग्राही भजन् कृष्णं योषिद्-भावाश्रिते'त्मनि
    वीरवत् कुरुते बाह्ये शारीरं कर्म नित्यशः
  • पद 18भजन
    वैष्णवाः कोमल-श्रद्धा मध्यमाश् चोत्तमास् तथा
    ग्रन्थम् एतत् समासाद्य मोदन्तां कृष्ण-प्रीतये
  • पद 12अर्थ
    सार-ग्राही वैष्णव अपने भीतर स्त्री-भाव का आश्रय लेकर कृष्ण की भक्ति करते हुए भी बाहर अपने शरीर के कर्तव्य वीर पुरुष की भाँति नित्य निभाता है।
  • पद 18अर्थ
    कोमल श्रद्धावाले, मध्यम और उत्तम, सभी वैष्णव इस ग्रंथ को पाकर कृष्ण-प्रेम की प्राप्ति के लिए आनंदित हों।
3 पद भजन में 3 पद अर्थ में 4

भक्तिविनोद ठाकुर · कल्याण-कल्पतरु

  • पद 1भजन
    जनम स-फल ता'र कृष्ण-दरशन जा'र
    भाग्य होइयाछे एक-बार
    बिकशिया हृन्-नयन कोरि' कृष्ण-दरशन
    छारे जीब चित्तेर बिकार
  • पद 4भजन
    इन्द्रनील जिनि' कृष्ण-रूप-खनि
    हेरिया कदम्ब-मूले
    मन उचाटन ना चले चरण
    सोंसार गेलाम भुले
  • पद 1अर्थ
    जिसने एक बार भी कृष्ण का दर्शन कर लिया, उसका जन्म सफल हो गया, वह भाग्यशाली बन गया। हृदय के नेत्र खोलकर कृष्ण का दर्शन करते ही वह जीव चित्त के सब विकारों को त्याग देता है।
  • पद 4अर्थ
    नीलम को भी लजाने वाले, सौंदर्य की खान कृष्ण को कदंब वृक्ष के नीचे देखकर मेरा मन व्याकुल हो उठता है, मेरे पग वहाँ से हटते ही नहीं, और मैं संसार को पूरी तरह भूल जाती हूँ।
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  • पद 7भजन
    सदा आशा कोरि भृङ्ग-रूप धोरि'
    चरण-कमले स्थान
    अनायासे पाइ कृष्ण-गुण गाइ
    आर ना भजबो आन
  • पद 7अर्थ
    मैं सदा यही चाहती हूँ कि भ्रमर बनकर उनके चरण-कमलों में सहज ही स्थान पाऊँ, और वहीं कृष्ण के गुणों का गान करूँ। अब मैं किसी और की उपासना नहीं करूँगी।