श्री शची अलय अति शोभमय
शची का घर अत्यन्त सुन्दर और शोभामय है। शीघ्र ही वह आनन्द के सागर से भर उठेगा। आज अधिवास का उत्सव है। आज आनन्दमय भगवान् गौर, जो स्वयं कृष्ण हैं, गोकुल के चन्द्र कृष्ण, अनेक लीलाएँ करेंगे।
किसी का हृदय शान्त नहीं है। चारों दिशाओं से किशोरियाँ आ रही हैं। मैं इनकी उपमा किससे दूँ? ये मानो सुन्दर चन्द्रमाओं की एक माला हैं, जो एक साथ चमक रही है।
किशोरियों ने अद्भुत रंग-बिरंगे वस्त्र और सुन्दर चमकते आभूषण पहने हैं। उनके हर अंग में वेश और शृंगार सुन्दर ढंग से सजा है। सुन्दर भाव-भंगिमाओं के साथ वे चलती हैं। किशोरियों की कतार-पर-कतार नदिया की गलियों को प्रकाश से भर रही है।
उनकी कितनी ही अभिलाषाएँ हैं! वे माता शची के पास जाती हैं। वे उन्हें प्रणाम करती हैं और आदर से उनकी पूजा करती हैं। नरहरि के स्वामी अब आँगन में आते हैं। उनका मुख देखकर हर किसी का हृदय शीतल आनन्द से भर जाता है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरहरि दास
- पद
- 4