Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

श्री कृष्णे सेबिबो बोलि' गृह छाडि' कुञ्जे चोलि'

श्री-कृष्णे सेबिबो बोलि' गृह छाडि' कुञ्जे चोलि' जाइते होय अभिसारी सखी कुञ्ज सज्जा कोरे जबे बासक सज्जा ह'न तबे उत्कण्ठित कृष्ण-पथ लखि'
अर्थ

1. अभिसारिका: 'मैं कृष्ण की सेवा करूँगी' ऐसा सोचकर वह घर छोड़कर वन में जाती है। 2. वासक-सज्जा: वह कुञ्ज को सजाती है। 3. उत्कण्ठिता: वह उत्सुकता से मार्ग पर कृष्ण के आने की प्रतीक्षा करती है।

काल उल्लङ्घिया होरि भोग-चिह्न देहे धोरि' ऐले हन खण्डिता तखन सङ्केते पाइया बैसे तबु कन्त ना आइसे बिप्रलब्धा नायिका तो' हन
अर्थ

4. खण्डिता: विलम्ब से आते हुए कृष्ण के शरीर पर दूसरी गोपी के साथ रमण के चिह्न देखकर वह खण्डिता हो जाती है। 5. विप्रलब्धा: वह मिलन-स्थान पर पहुँचकर बैठती है, परन्तु प्रियतम कृष्ण नहीं आते।

मानेर कलहे होरि जन चलि दुःख कोरि' कलहान्तरित सन्तापिनी मथुराते कान्त गेलो बहु-दिन ना आइलो प्रोषित-भर्तृका काङ्गालिनी
अर्थ

6. कलहान्तरिता: मानपूर्ण कलह में कृष्ण को विदा कर वह अत्यंत दुःखी हो जाती है। 7. प्रोषितभर्तृका: उसके प्रियतम कृष्ण मथुरा चले जाते हैं और अनेक दिनों तक नहीं लौटते। वह अत्यंत कष्ट सहती है।

निजायत्ते कान्ते पेये' क्रीडा कोरे कान्त लो'ये स्वाधीन-भर्तृका से रमणी नायिका-मात्रेर होय एइ अष्ट-दशोदय बिप्रलम्भ-सम्भोग-बोधिनी
अर्थ

8. स्वाधीनभर्तृका: अपने प्रियतम को अपने वश में रखकर वह उन्हें अपनी लीलाओं में सम्मिलित करती है। ये आठ अवस्थाएँ केवल नायिकाओं द्वारा ही अनुभव की जाती हैं। इन्हीं के माध्यम से वे कभी कृष्ण के साथ सीधे लीला का सुख पाती हैं और कभी उनके वियोग में कष्ट सहती हैं।

इस भजन के बारे में

ग्रन्थ
गीतमाला
पद
4