श्री कृष्णे सेबिबो बोलि' गृह छाडि' कुञ्जे चोलि'
1. अभिसारिका: 'मैं कृष्ण की सेवा करूँगी' ऐसा सोचकर वह घर छोड़कर वन में जाती है। 2. वासक-सज्जा: वह कुञ्ज को सजाती है। 3. उत्कण्ठिता: वह उत्सुकता से मार्ग पर कृष्ण के आने की प्रतीक्षा करती है।
4. खण्डिता: विलम्ब से आते हुए कृष्ण के शरीर पर दूसरी गोपी के साथ रमण के चिह्न देखकर वह खण्डिता हो जाती है। 5. विप्रलब्धा: वह मिलन-स्थान पर पहुँचकर बैठती है, परन्तु प्रियतम कृष्ण नहीं आते।
6. कलहान्तरिता: मानपूर्ण कलह में कृष्ण को विदा कर वह अत्यंत दुःखी हो जाती है। 7. प्रोषितभर्तृका: उसके प्रियतम कृष्ण मथुरा चले जाते हैं और अनेक दिनों तक नहीं लौटते। वह अत्यंत कष्ट सहती है।
8. स्वाधीनभर्तृका: अपने प्रियतम को अपने वश में रखकर वह उन्हें अपनी लीलाओं में सम्मिलित करती है। ये आठ अवस्थाएँ केवल नायिकाओं द्वारा ही अनुभव की जाती हैं। इन्हीं के माध्यम से वे कभी कृष्ण के साथ सीधे लीला का सुख पाती हैं और कभी उनके वियोग में कष्ट सहती हैं।