सु रम्य मधुर स्मित सर्ब सल् लखणान्वित
भगवान कृष्ण की मुस्कान अत्यंत मधुर है। उनका दिव्य शरीर परम सुन्दर है, और उस शरीर में समस्त शुभ लक्षण विद्यमान हैं। उनका शरीर बलवान, दृढ़ और युवा है। वे गम्भीर, वाक्पटु, अत्यंत प्रिय वाणी बोलने वाले, बुद्धिमान, प्रतिभाशाली, कला-भोग में निपुण, अत्यंत चतुर, सुखी और धीर हैं।
वे कृतज्ञ, सरल और उदार हैं, सबसे प्रिय हैं, सर्वोपरि हैं, यशस्वी हैं, स्त्रियों के मन को मोहित करने वाले हैं, क्रीड़ा-प्रिय और सदा नित नूतन तथा युवा हैं। उनका सौन्दर्य और ऐश्वर्य अतुलनीय है। वे बाँसुरी बजाने में परम निपुण हैं। वे ही सर्वोपरि हैं।
वे धीरोदात्त (गम्भीर और उदार), धीर-प्रशान्त (शांत और सहनशील), सुधीर (गम्भीर और बुद्धिमान), धीर-ललित (विनोद में निपुण), ललित (मनोहर), कान्त (सुन्दर), और धीरोद्धत (गर्वयुक्त और चंचल) हैं। वे स्त्रियों के लिए नायक हैं। चेटक और विट सेवकों से घिरे रहते हैं, विदूषक मित्रों की सेवा पाते हैं, और पीठमर्द तथा प्रिय-नर्म-सखा मित्रों द्वारा सेवित होते हैं।
इन पाँच प्रकार के सेवकों और मित्रों की सहायता से वे अनेक लीलाएँ करते हैं। वे पति और उपपति दोनों रूपों में भी लीला करते हैं। वे मित्रवत्, छली, ढीठ और निपुण हैं। वे रसों के अमृत का आस्वादन करने के लिए सदा उत्सुक रहते हैं। उनका स्वरूप ही रस का साक्षात रूप है। वे कुञ्जों में विहार करते हैं।