शुन शुन ए सखि निवेदन तोय
सुनो, सुनो, हे सखी, मेरी यह विनती, तुम मेरे हृदय की पीड़ा को जानती हो।
मेरे नाथ चतुर सखाओं के बीच बैठे हैं; ऐसे बोलना कि कोई लज्जा न हो।
सखियों में तुम्हें ही सबसे चतुर जानती हूँ, मेरी लाज बचाते हुए हमारा मिलन करवा दो।
अब ऐसी कोई युक्ति रचो जिससे कान्हा से मिलन में कोई बाधा न आए।
यदि जीते-जी मैं अपने नाथ को पा लूँ, तो गोविन्द दास तुम्हारा यश गाएँगे।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- गोविन्द दास कविराज · जीवनी पढ़ें
- पद
- 5