तं रहसि गतं किशलय शयन शयनं
कृष्ण की बाँसुरी के मधुर संगीत ने राधा को विस्मय से भर दिया और वे बेहोश हो गईं। उस एकान्त स्थान में खिलती हुई कोमल टहनियों की शय्या पर अचेत पड़ी राधा को कृष्ण ने निहारा।
राधा के मुख की अमृतमयी चाँदनी से कृष्ण के मुख का चन्द्रकान्त मणि पिघल गया। आँसुओं ने कृष्ण की आँखों को सजाने वाली काली मसी (काजल) को बहा दिया।
राधा अपने हृदय की वन की आग में कृष्ण को खोजती रहीं। यद्यपि कृष्ण उनके सामने प्रकट थे, फिर भी उन्होंने यही समझा कि कृष्ण उनके हृदय में हैं, और किसी युक्ति से वे अब बाहर प्रतिबिम्ब के रूप में दिख रहे हैं।
राधा ने समझा कि उनके वक्ष पर लगा लाल कुंकुम का चूर्ण किसी जलाने वाले रोग का लक्षण है। कृष्ण ने समझा कि यह प्रेम है, जो राधा के हृदय से उमड़कर बाहर आ गया है।
राधा को देखते हुए कृष्ण का हृदय प्रेम से भर गया और उनके शरीर में आनन्द-भाव के लक्षण प्रकट हो गए। वे निश्चल मूर्ति की तरह खड़े रह गए, और उन्होंने देखा कि राधा भी मूर्ति जैसी लग रही हैं।
राधा के प्रेम की परीक्षा लेने की इच्छा से कृष्ण ने जादू का ऐसा भ्रम रचा कि वे स्वयं मूर्ति जैसे दिखाई देने लगे।
कृष्ण राधा के चिन्तन में लीन रहे। वे राधा को पाने के लिए तरसते रहे। वृन्दा के कहने पर बड़ी कठिनाई से उन्होंने वह जादू का भ्रम छोड़ा।
कृष्ण राधा के लिए शोक करने लगे। चतुर वृन्दा की सलाह मानकर कृष्ण ने अपने जीवन लौटा देने वाले चरण-कमल राधा के हृदय पर रख दिए।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- जीव गोस्वामी · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- गोपाल-चम्पू
- पद
- 8