तव सुनुर् मुहुर् अनयं कुरुते
“आपका बेटा बार-बार शरारत करता है।”
“हे निन्दा करने वाली, उसने क्या कर दिया?”
“वह इधर-उधर घूमकर बछड़ों को खोल देता है।”
“वह तुम्हारा मित्र है। वह तो सहायता करने के लिए ऐसा करता है।”
“वह बेमौके बछड़ों को खोल देता है। इससे हमें बड़ा दुःख होता है।”
“वह ऐसा क्यों करेगा? यदि कोई कारण न हो तो कौन ऐसा करेगा?”
“हे रानी, वह यह सब बिना किसी कारण के करता है।”
“हे भद्र नारी, तुम उसे क्रोध करके डाँटती क्यों नहीं?”
“जब मैं उसे डाँटती हूँ तो वह मुझ पर हँसता है।”
“उस पर पानी उछाल दो। इससे वह रुक जाएगा।”
“वह मेरा स्वादिष्ट खाना चुराकर खा जाता है।”
“अरी नासमझ, तुम खाने को सबके सामने खुला क्यों रखती हो?”
“वह सब चोरों का गुरु है।”
“यह सच नहीं है। यह सब झूठ है।”
“वह मेरे दूध के भण्डार तक पहुँचने के लिए पीढ़े या ऐसी ही किसी चीज़ पर खड़ा हो जाता है।”
“तो अपना दूध बहुत ऊँचाई पर रखो, ताकि वह वहाँ पहुँच ही न सके।”
“जब ऊँचाई के कारण वह मटके तक नहीं पहुँच पाता, तो उसमें छेद करने का कोई तरीका निकाल लेता है।”
“हे भद्र नारी, इतना सब करने की बुद्धि उसमें कैसे हो सकती है?”
“वह बहुत बुद्धिमान है।”
“मैं कहती हूँ कि यह सम्भव नहीं है। वह तो केवल बालक है।”
“वह मेरे छिपाने की सब जगहें जानता है।”
“क्या तुम्हारी अँधेरी कोठरी भी उसे नहीं डराती?”
“मेरी कोठरी बेकार है। उसके शरीर की ज्योति अँधेरे को प्रकाशित कर देती है।”
“तो मैं उसके शरीर पर काले अंगराग का लेप लगा दूँगी। इससे उसकी ज्योति ढक जाएगी। मैं यह तुम्हारे सामने ही करूँगी। तुम देखती रहना कि मैं कैसे करती हूँ।”
“उसके रत्नों की ज्योति ने अँधेरे को बहुत तुच्छ कर दिया है।”
“कौन-सा बालक बिना आभूषणों के रह सकता है?”
“वह बन्दर को भी खिलाता है।”
“तुम्हारे विचार में वह अकेला कितना खा सकता है?”
“जब वह मटके तक नहीं पहुँच पाता तो उसे तोड़ देता है।”
“यह उसका तुम्हें यह बताने का तरीका है कि मटका अशुद्ध है।”
“जब वह जाता है तो छोटे बच्चों को रुला देता है।”
“यह सच नहीं है। वह व्रज की भली स्त्रियों के साथ हमेशा अच्छा व्यवहार करता है।”
“वह मेरे घर में पेशाब कर देता है!”
“नहीं! नहीं! वह तो तेल पर गिरी हुई कुछ धूल है!”
“वह आपके सामने बिलकुल स्थिर खड़ा है।”
“वह तुम्हारे शब्दों की बाढ़ से आश्चर्य में पड़ गया है।”
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- जीव गोस्वामी · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- गोपाल-चम्पू
- पद
- 18