श्री खोलावेचा श्रीधर
नवद्वीप के खोला-विक्रेता
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परिचय
खोलावेचा श्रीधर का अर्थ है "खोला बेचने वाला श्रीधर"। श्री चैतन्य महाप्रभु जिस समय स्वयं नवद्वीप में गृहस्थ जीवन जी रहे थे, उस समय श्रीधर वहाँ के सबसे निर्धन लोगों में गिने जाते थे। फिर भी वे प्रभु के सबसे प्रिय साथियों में से एक थे। वे खोला बेचकर किसी तरह अपना गुजारा करते थे। खोला केले के वृक्ष की छाल की पट्टियाँ होती हैं, जिनसे एक बार काम में आने वाले दोने बनते थे। साथ ही वे अपने छोटे-से बाग़ के केले के फूल, डंठल और फल भी बेचते थे। उनके पास लगभग कुछ भी नहीं था। उनका धातु का जलपात्र भी टूटा हुआ था। फिर भी युवा निमाई पण्डित, जिन्हें उस समय तक संसार श्री चैतन्य महाप्रभु के नाम से नहीं जानता था, हर दिन उनकी दुकान पर जाते, उनसे मोल-भाव करते और उनके टूटे लोहे के घड़े से जल पी लेते। यह उनका नित्य नियम बन गया था। हरिदास ठाकुर की तरह श्रीधर भी उन गिने-चुने भक्तों में हैं, जिन्हें परम्परा इसीलिए स्मरण करती है कि प्रभु को अर्पित करने के लिए उनके पास कोई सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं थी। उनके पास केवल अखण्ड, एकनिष्ठ भक्ति थी। और अन्त में श्री चैतन्य महाप्रभु ने उसी को सबसे अधिक मूल्यवान माना।
| विवरण | वर्णन |
|---|---|
| व्यवसाय | खोला (केले के वृक्ष की छाल, जिससे एक बार काम में आने वाले दोने बनते थे) तथा अपने बाग़ की केले की उपज (फूल, डंठल, फल) बेचना |
| निवास | नवद्वीप में, मायापुर के निकट, उस स्थान पर जो बाद में श्रीधर आंगन कहलाया |
| अन्य नाम | श्रीधर पण्डित, खोलावेचा श्रीधर, कोलावेचा श्रीधर |
| नित्य नियम | अपने ऊपर कुछ भी खर्च करने से पहले दिन-भर की कमाई का आधा भाग माता गंगा की पूजा में अर्पित करना |
| सबसे प्रसिद्ध लीला | श्री चैतन्य महाप्रभु का प्रतिदिन उनकी वस्तुओं पर मोल-भाव करना और उनके टूटे लोहे के घड़े से जल पीना; अन्त में महाप्रभु ने उन्हें अपना कृष्ण-बलराम स्वरूप दिखाया |
| पहचान | कुसुमासव, व्रज में कृष्ण को हँसाने वाले ग्वाल-सखा (गौर-गणोद्देश-दीपिका 133; चैतन्य-चरितामृत आदि 10.67 तात्पर्य) |
| विरासत | श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर के निर्देशन में बना श्रीधर आंगन का मन्दिर आज भी मौजूद है, और मायापुर परिक्रमा में भक्त इसके दर्शन करने जाते हैं |
परिचय के शास्त्र प्रमाण (1)
खोलावेचतया ख्यातः पण्डितः श्रीधरो द्विजः ।
आसीद्व्रजे हास्यकारी यो नाम्ना कुसुमासवः ॥१३३॥
kholāvecatayā khyātaḥ paṇḍitaḥ śrīdharo dvijaḥ |
āsīd vraje hāsya-kārī yo nāmnā kusumāsavaḥ ||133||
जो ग्वालबाल कृष्ण-लीला में कुसुमासव के नाम से जाने जाते थे, वही बाद में नवद्वीप में चैतन्य महाप्रभु की लीला में खोलावेचा श्रीधर बने।
तात्पर्य से: कवि-कर्णपूर के अनुसार श्रीधर वृन्दावन के एक ग्वालबाल थे, जिनका नाम कुसुमासव था।
यह श्लोक खोलावेचा श्रीधर को कुसुमासव बताता है, वह ग्वालबाल जो व्रज में कृष्ण को हँसाते थे। संस्कृत: गौर-गणोद्देश-दीपिका का सविशेषचिह्न (डायक्रिटिक) संस्करण; अनुवाद: श्रील प्रभुपाद, चैतन्य-चरितामृत आदि 10.67 का तात्पर्य।
अध्याय 2
गंगा के प्रति नित्य व्रत
वे अपनी आय का आधा भाग स्वयं पर कुछ भी व्यय करने से पहले क्यों दान कर देते थे, और उनकी रातों की जागृति के बारे में पड़ोसियों ने क्या गलत समझा।
श्रीधर दिन-भर में जितना भी कमाते, चाहे कितना भी कम हो, वे और कुछ करने से पहले उसे दो भागों में बाँट देते थे। आधा भाग माता गंगा के पूजन में जाता, और शेष आधा ही उनके अपने जीवन-निर्वाह के लिए बचता था। श्रील प्रभुपाद ने इस नियम को श्री चैतन्य-चरितामृत आदि-लीला 10.67 के अपने तात्पर्य में सीधे शब्दों में दर्ज किया है: "वे अपनी आय का पचास प्रतिशत गंगा-पूजन में व्यय करते थे, तथा शेष भाग अपने भरण-पोषण में काम लेते थे।" सोचिए, श्रीधर जैसी स्थिति वाले व्यक्ति के लिए इसका क्या अर्थ था। यह किसी धनी गृहस्थ का अपने फालतू धन में से थोड़ा-सा दान करना नहीं था। श्रीधर तो एक साबुत जलपात्र तक नहीं ख़रीद सकते थे। फिर भी वे अपनी पहले से ही बहुत कम आय का आधा भाग, अपने लिए कुछ भी रखने से पहले, दान कर देते थे।
यहाँ क्रम ही मायने रखता था। यह व्रत ऐसा नहीं था कि "जो कुछ बच जाए वह गंगा को दे दो"। उनके जीवन में कुछ बचने की सम्भावना तो बहुत कम रहती थी। इसलिए उन्होंने स्वयं यह नियम बनाया कि भेंट हर दिन, बिना किसी अपवाद के, सबसे पहले दी जाएगी। इसे निभाने के बाद ही श्रीधर अपनी ज़रूरतों की ओर ध्यान देते थे। उनके जीवन में लगभग कुछ भी स्थिर या निश्चित नहीं था। फिर भी हर दिन कुछ अलग रख देना अपने आप में एक अनुशासन था। यह इतनी बार दोहराया गया कि आगे चलकर यह उनका केवल एक कर्म न रहकर उनका स्वभाव ही बन गया।
धन का एक भिन्न मापदण्ड #
गौड़ीय वैष्णव परम्परा में उनके जीवन की जो कथाएँ सुनाई जाती हैं, उनमें बताया गया है कि एक बार युवा निमाई पण्डित के रूप में प्रभु ने श्रीधर से सीधे पूछा कि वे विष्णु की इतनी श्रद्धा से उपासना करते हैं, फिर भी इतने निर्धन क्यों हैं। मानो भक्ति से उनकी परिस्थिति में कुछ राहत आ जानी चाहिए थी। परम्परा के अनुसार, श्रीधर ने उत्तर में अपनी तुलना उस पक्षी से की जो पेड़-पेड़ पर घोंसला बनाता है और हर दिन बस पेट भरने लायक भोजन पा लेता है। ऐसा जीवन जीते हुए भी वे उतने ही सन्तुष्ट थे, जितना अपने महल में धन के हर सुख का भोग करने वाला कोई राजा। उनके कहने का भाव यह था कि इन दोनों के बीच का अन्तर धन से मापा ही नहीं जा सकता। केले की छाल बेचकर जीविका चलाने वाले इस व्यक्ति की बात में वैष्णव दर्शन की एक छोटी-सी सीख छिपी थी: जिसे कृष्ण के प्रति प्रेम है, वही धनी है, और जिसे नहीं है, वह चाहे कितना भी क्यों न रखता हो, निर्धन ही है।
रात-भर नाम-कीर्तन #
यही अनुशासन रात में भी चलता रहता था। श्रीधर रात-दर-रात देर रात तक हरिनाम-कीर्तन करते हुए जागते रहते थे। पड़ोसियों ने उनकी यह आदत देखी, पर उसे ग़लत समझा। उनका रहन-सहन देखकर पड़ोसियों का ऐसा सोचना स्वाभाविक भी था कि उन्हें निर्धनता की भूख सोने नहीं दे रही, भक्ति नहीं। किसी ने यह सोचा तक नहीं कि हो सकता है यह निर्धन खोला-विक्रेता अपनी रातें भजन में इसलिए बिताता हो, क्योंकि वह यही करना चाहता है। स्रोतों में यह एक छोटा-सा विवरण है, पर यह उनके बारे में ज्ञात हर बात से मेल खाता है। उनकी भक्ति इतनी शान्ति से और इतनी लगातार चलती रही कि आस-पास के लोग उसे कुछ और ही समझ बैठे। श्रीधर जब इस तरह चुपचाप, स्थिर भक्ति का जीवन जी रहे थे, उसी समय श्री चैतन्य महाप्रभु ने भी अपना एक नित्य नियम शुरू किया। वे हर दिन श्रीधर की दुकान पर जाने लगे, जैसा जलपात्र के लिए महाप्रभु की लीला में बताया गया है।
इस अध्याय के शास्त्र प्रमाण (1)
khola-veca sridhara prabhura priya-dasa
yanha-sane prabhu kare nitya parihasa
उनतीसवीं शाखा श्रीधर थे, केले के वृक्ष की छाल के व्यापारी। वे प्रभु के अत्यन्त प्रिय सेवक थे। अनेक अवसरों पर प्रभु ने उनके साथ विनोद किया।
तात्पर्य से: तात्पर्य का अंश: "श्रीधर एक निर्धन ब्राह्मण थे जो कप बनाने के लिए केले के वृक्ष की छाल बेचकर जीवन-निर्वाह करते थे। वे अपनी आय का पचास प्रतिशत गंगा-पूजन में व्यय करते थे, तथा शेष भाग अपने भरण-पोषण में काम लेते थे।"
यह वही तात्पर्य है जो श्रीधर के मुख्य जीवन-परिचय वाले पृष्ठ पर उद्धृत है। यहाँ बताए गए आधी-आधी कमाई वाले व्रत का सीधा स्रोत यही है। उनकी उस निर्धनता का स्रोत भी यही है, जिसे देखकर उनकी दैनिक साधना का मूल्य समझ में आता है।
अध्याय 3
जलपात्र के लिए महाप्रभु की लीला
केले के पत्तों और एक टूटे लोहे के घड़े को लेकर वर्षों तक चलने वाला दैनिक मोल-भाव, जिसे दोनों में से कोई भी सचमुच सुलझाना नहीं चाहता था।
अधिकांश लोग श्रीधर को किसी एक नाटकीय दृश्य के कारण नहीं, बल्कि एक आदत के कारण जानते हैं। यह ऐसी बात थी जो श्री चैतन्य महाप्रभु वर्षों तक लगभग हर दिन करते रहे। युवा निमाई पण्डित के रूप में वे श्रीधर की दुकान पर आते। बिक्री के लिए रखे केले के पत्तों, फूलों और डंठलों में से जो चाहते ले लेते। वे श्रीधर को माँगे गए मूल्य से कहीं कम देते, कभी बस नाममात्र के पैसे, तो कभी कुछ भी नहीं। फिर जाने से पहले वे सीधे श्रीधर के अपने घड़े से जल पी लेते। वह एक पुराना, दरार पड़ा लोहे का घड़ा था, जो उस निर्धन ब्राह्मण का एकमात्र जलपात्र था। श्री चैतन्य-चरितामृत इस आदत को एक ही पंक्ति में दर्ज करता है: "प्रतिदिन भगवान चैतन्य महाप्रभु विनोदपूर्वक श्रीधर से फल, फूल और गूदा छीन लेते और उनके टूटे लोहे के घड़े से जल पीते" (आदि 10.68)। ऐसे विवरण को किसी संक्षिप्त अध्याय में केवल एक पंक्ति इसलिए मिलती है, क्योंकि सबको इसके पीछे की पूरी कथा पहले से मालूम थी।
श्री चैतन्य-भागवत वह पूरी कथा सुनाता है। यह किसी एक चोरी की घटना कम, और दोनों के बीच वर्षों तक चलने वाला आधा हँसी-मज़ाक, आधा सच्चा झगड़ा ज़्यादा लगता है, जिसे मानो कोई भी समाप्त नहीं करना चाहता था। "तुम मेरे हाथों से माल क्यों ले जा रहे हो? क्या तुम अब भी नहीं जानते कि मैं कौन हूँ?" प्रभु उन्हें छेड़ते हुए यह पूछते। श्रीधर चिढ़ते, पर कभी सचमुच क्रोधित नहीं होते, और उसी भाव में उत्तर देते। कभी वे बनावटी दीनता से उत्तर देते ("सुनिए, हे आदरणीय ब्राह्मण। मुझे क्षमा कीजिए, क्योंकि मैं तो आपका कुत्ता हूँ")। कभी वे उन्हें बस कहीं और चले जाने को कहते ("क्या और दुकानें नहीं हैं? वहाँ जाकर सस्ते पत्ते खरीद लीजिए")। किसी और दिन प्रभु सीधे उनकी निर्धनता को लेकर उन्हें कुरेदते। प्रभु पूछते कि श्रीधर सन्न्यासी की तरह क्यों रहते हैं, जबकि प्रभु की दृष्टि में तो उनके पास इतना धन है। तब श्रीधर एक डंठल, कुछ केले, कुछ पत्ते दे देने की बात कहते और पूछते, "तो क्या अब भी मेरा दोष है?" अगले दिन यह झगड़ा फिर ऐसे शुरू हो जाता, मानो कभी सुलझा ही न हो। और एक तरह से वह कभी सुलझा भी नहीं था।
प्रभु सीधे मूल्य क्यों नहीं चुकाते थे #
इस हँसी-मज़ाक के पीछे असल में क्या चल रहा था, इस बारे में श्री चैतन्य-भागवत बिलकुल स्पष्ट है। भक्त प्रेम से जो कुछ अर्पित करता है, चाहे वह कितना भी छोटा हो, भगवान उसे उस वस्तु से कहीं अधिक मूल्यवान मानते हैं, जो कोई अभक्त पूरा मूल्य या उससे भी अधिक देकर अर्पित करे। इनमें से अधिकांश लेन-देन के समय श्रीधर को यह पता नहीं था कि हर दिन केले के पत्तों को लेकर उनसे झगड़ने वाला कौन है। वे बस इतना जानते थे कि एक चंचल युवा ब्राह्मण बार-बार आते हैं, जितना चुकाते हैं उससे अधिक ले जाते हैं, और उनके टूटे घड़े से ऐसे जल पीते हैं मानो वह नवद्वीप का सबसे अच्छा जलपात्र हो। फिर भी, इतने ऊँचे स्वर में विरोध करने के बावजूद, श्रीधर ने उन्हें एक बार भी लौटाया नहीं।
एक घड़ा, अनेक पुनर्कथाएँ #
श्रीधर के जीवन की बाद की कथाएँ कभी-कभी इस वर्षों पुरानी आदत को एक ही सजीव दृश्य में बदल देती हैं। उसमें प्रभु स्वयं जलपात्र खरीदना चाहते हैं, या उसे बस ले लेते हैं। यह दृश्य अक्सर श्रीधर के घर पर, उस स्थान पर हुआ बताया जाता है जिसे अब श्रीधर आंगन कहा जाता है। यह रूप असल में ग़लत नहीं है। यह कथा को छोटे में कहने का एक ढंग है। श्री चैतन्य-चरितामृत और श्री चैतन्य-भागवत दोनों इसे किसी एक नाटकीय घटना के रूप में नहीं, बल्कि लगभग रोज़ होने वाली बात के रूप में बताते हैं। यह रूप उसी बात को एक चित्र में दिखा देता है। सभी रूप उस वस्तु और उसके अर्थ के बारे में सहमत हैं। वह दरार पड़ा एक लोहे का जलपात्र था, और श्रीधर के पास केवल वही एक था। प्रभु उससे जल इसलिए नहीं पीते थे कि उन्हें जल की ज़रूरत थी। वे इसलिए पीते थे कि वह श्रीधर का अपना था, और ऐसे व्यक्ति ने सरलता और सच्चाई से दिया था, जिसके पास देने के लिए लगभग और कुछ भी नहीं था। यह सम्बन्ध वर्षों के हँसी-मज़ाक से, और ऐसे झगड़े से बना था जिसे दोनों में से कोई छोड़ना नहीं चाहता था। अन्त में जब प्रभु ने श्रीधर को दिखाया कि शुरू से उनसे झगड़ा कौन कर रहा था, तब इसी सम्बन्ध का सहारा लिया। इसकी कथा महाप्रकाश और श्रीधर का वर में बताई गई है।
इस अध्याय के शास्त्र प्रमाण (2)
ऊपर पाठ में उद्धृत:
- Adi 10.68 Sri Chaitanya-caritamrta
- Madhya-khanda 9.167 Sri Chaitanya-Bhagavata
अध्याय 4
महाप्रकाश और श्रीधर का वर
वह रात जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने श्रीधर को अपना कृष्ण-बलराम स्वरूप दिखाया, और वह एक वर जो श्रीधर ने बदले में माँगा।
श्री चैतन्य-भागवत के अनुसार, आगे की घटना एक असाधारण भाव-आवेश की रात में हुई। ग्रन्थ स्वयं कहता है कि वह रात इक्कीस घण्टे तक चली। उस समय श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने अन्तरंग भक्तों को एक के बाद एक अपनी दिव्यता का दर्शन कराया। बाद के वृत्तान्त इस दृश्य को नवद्वीप में श्रीवास ठाकुर के घर पर हुआ बताते हैं। श्रीधर की बारी इसी के बीच आई। प्रभु ने उनसे साफ़ शब्दों में देखने को कहा: "हे श्रीधर, मेरा स्वरूप देखो। आज मैं तुम्हें आठों सिद्धियाँ प्रदान करूँगा।" फिर उन्होंने श्रीधर को एक चतुर्भुज स्वरूप दिखाया, जिसके हाथ में एक मनोहर मुरली थी। उनकी दाहिनी ओर बलराम खड़े थे। अनन्त शेष अपने सहस्र फणों को छत्र की तरह ऊपर धारण किए थे। और सनक, नारद तथा शुकदेव सहित ऋषिगण यह दर्शन कर रहे थे। कवि-कर्णपुर की गौर-गणोद्देश-दीपिका पहले ही बता चुकी थी कि श्रीधर ही ग्वाल-बालक कुसुमासव हैं। कृष्ण और बलराम का एक साथ यही वह स्वरूप था, जिसकी सेवा कुसुमासव ने कभी वृन्दावन में की थी। अब वही स्वरूप सीधे उस व्यक्ति के सामने प्रकट हुआ, जिन्होंने वर्षों तक केले के पत्तों को लेकर प्रभु से झगड़ा किया था।
श्रीधर यह दृश्य शान्त भाव से नहीं देख सके। वे विस्मय से अभिभूत होकर लड़खड़ाए और ज़मीन पर गिर पड़े। जब प्रभु ने उनसे स्तुति करने को कहा, तो वे बस इतना ही कह सके कि वे इतने मूर्ख हैं कि स्तुति के लिए शब्द ही नहीं ढूँढ पा रहे। श्री चैतन्य-भागवत कहता है कि प्रभु की ही आज्ञा से वाणी की देवी सरस्वती उनकी जिह्वा पर प्रकट हुईं। उन्हीं के द्वारा श्रीधर बोलने लगे। उन्होंने प्रभु की स्तुति की और उन्हें सिद्धियों का, ऐश्वर्य और योग का, भक्ति और मुक्ति का, यहाँ तक कि ब्रह्मा और शिव का भी मूल स्रोत बताया, क्योंकि ये सभी प्रभु के अधीन हैं। उसी साँस में उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि उनके अपने पापी हृदय ने एक बार भी नहीं पहचाना कि वे किससे झगड़ रहे थे। बाद में जब प्रभु ने बार-बार "माँगो, माँगो" कहकर उनसे कोई वर माँगने का आग्रह किया, तो श्रीधर में पहले उत्सुकता नहीं, सावधानी दिखाई दी। उन्होंने कहा: "हे प्रभु, क्या आप मुझे पुनः छलेंगे? शान्त रहिए, क्योंकि यह पुनः सम्भव नहीं होगा।" यह ऐसे व्यक्ति की प्रतिक्रिया थी जिसे वर्षों तक छेड़ा गया था, और जो अब भी तय नहीं कर पा रहा था कि जो कुछ दिख रहा है, उस पर विश्वास करे या नहीं।
केवल एक निवेदन #
जब श्रीधर ने आख़िरकार कुछ माँगा, तो उन्होंने धन, सिद्धि या मुक्ति में से कुछ भी नहीं माँगा, जबकि प्रभु यह सब कुछ देने को तैयार थे। श्री चैतन्य-भागवत, मध्य-खण्ड 9.223-225 के अनुसार, उनका निवेदन यह था: "जिस ब्राह्मण ने बलपूर्वक मेरे केले के पत्ते छीन लिए, वही जन्म-जन्मान्तर मेरे प्रभु हों। जिस ब्राह्मण ने सदैव मुझसे झगड़ा किया, उन्हीं के चरण-कमलों की सेवा में मैं सदा संलग्न रहूँ।" गौड़ीय हिस्ट्री ने इन्हीं श्लोकों का एक अलग अनुवाद प्रकाशित किया है, जिसमें भी यही भाव है: "जो ब्राह्मण मेरे केले के पत्ते और छाल को नोच लिया करते थे, वे जन्म-जन्मान्तर मेरे प्रभु हों। जो ब्राह्मण मुझसे झगड़ा किया करते थे, वे मेरे स्वामी हों, और मैं उन्हीं के चरण-कमलों की सेवा करूँ।" दोनों अनुवादों के शब्द अलग हैं, लेकिन मुख्य बात पर दोनों सहमत हैं। श्रीधर को अभी-अभी दिखाया गया था कि जो हर दिन उनसे मोल-भाव करते थे, वे साक्षात् कृष्ण और बलराम का संयुक्त स्वरूप हैं। फिर भी उन्हें बस यही चाहिए था कि यह मोल-भाव जन्म-जन्मान्तर चलता रहे। यह कहते-कहते उनका प्रेम उमड़ आया, और वे भुजाएँ उठाकर ऊँचे स्वर में रोने लगे। उनके चारों ओर खड़े वैष्णवगण उन्हें रोता देखकर स्वयं भी भाव-विभोर हो गए और उनके साथ रो पड़े।
यह वर उनके विषय में क्या बताता है #
ध्यान दीजिए कि श्रीधर के निवेदन में क्या-क्या नहीं है। वे न तो प्रभु की लीलाओं को समझने की माँग करते हैं, न भौतिक जीवन से मुक्ति की। वे उन सिद्धियों को भी नहीं माँगते, जो अभी-अभी उन्हें सीधे दी जा रही थीं। प्रभु के प्राकट्य ने इन सबका द्वार खोल दिया था। फिर भी वे बस इतना माँगते हैं कि आने वाले हर जीवन में वे उसी ब्राह्मण के सेवक बने रहें, जिन्होंने वर्षों तक उन्हें कम मूल्य दिया और छेड़ा। श्रीधर की भक्ति असल में कैसी थी, इसका सबसे स्पष्ट प्रमाण परम्परा में यही कथन है। यह ऐसे प्रभु के लिए प्रशंसा नहीं थी जिन्हें उन्होंने अभी-अभी असाधारण जाना था। यह उस व्यक्ति के प्रति निष्ठा थी जिनसे वे पहले से ही प्रेम करते थे, चाहे वे अन्त में कोई भी निकलते। यह निष्ठा उस एक असाधारण रात के बहुत बाद तक बनी रही, जैसा विरासत और स्मरण में बताया गया है।
इस अध्याय के शास्त्र प्रमाण (2)
শ্রীধর বলেন,—“প্রভু, আরো ভাঙ্ডাইবা? থাকহ নিশ্চিন্তে তুমি, আর না পারিবা”
śrīdhara balena,—"prabhu, āro bhāṅḍāibā?
thākaha niścinte tumi, āra nā pāribā"
श्रीधर ने उत्तर दिया, "हे प्रभु, क्या आप मुझे पुनः छलेंगे? शान्त रहिए, क्योंकि यह पुनः सम्भव नहीं होगा।"
भूमिपति दास द्वारा प्रकाशित श्री चैतन्य-भागवत के अंग्रेज़ी अनुवाद (wisdomlib.org) से उद्धृत, किसी प्रभुपाद-तात्पर्य से नहीं। प्राकट्य के तुरन्त बाद श्रीधर ने सावधानी से यह उत्तर दिया था। इसके बाद ही वे प्रभु से वर माँगने के लिए राज़ी हुए।
“মাগ মাগ” পুনঃ পুনঃ বলে বিশ্বম্ভর শ্রীধর বলযে,—“প্রভু, দেহ’ এই বর। যে ব্রাহ্মণ কাডি’ নিল মোর খোলা পাত সে ব্রাহ্মণ হৌক মোর জন্ম জন্ম নাথ। যে ব্রাহ্মণ মোর সঙ্গে করিল কন্দল মোর প্রভু হৌক তাঙ্র চরণ-যুগল”
"maga maga" punah punah bale visvambhara
sridhara balaye,—"prabhu, deha' ei vara
ye brahmana kadi' nila mora khola pata
se brahmana hauka mora janma janma natha
ye brahmana mora sange karila kandala
mora prabhu hauka tanra carana-yugala"
विश्वम्भर ने बार-बार कहा, "माँगो, माँगो," और श्रीधर ने उत्तर दिया, "हे प्रभु, तो मुझे यह वर दीजिए। जिस ब्राह्मण ने बलपूर्वक मेरे केले के पत्ते छीन लिए, वही जन्म-जन्मान्तर मेरे प्रभु हों। जिस ब्राह्मण ने सदैव मुझसे झगड़ा किया, उन्हीं के चरण-कमलों की सेवा में मैं सदा संलग्न रहूँ।"
भूमिपति दास द्वारा प्रकाशित श्री चैतन्य-भागवत के अंग्रेज़ी अनुवाद (wisdomlib.org) से उद्धृत, किसी प्रभुपाद-तात्पर्य से नहीं, क्योंकि vedabase.io पर चैतन्य-भागवत का कोई अलग संग्रह उपलब्ध नहीं है। यह श्रीधर की कथा का मुख्य श्लोक है। जब प्रभु ने स्वयं को प्रकट करके उनसे कोई भी वर माँगने को कहा, तब उन्होंने केवल यही माँगा कि वे जन्म-जन्मान्तर प्रभु के सेवक बने रहें। गौड़ीय हिस्ट्री ने भी इन्हीं श्लोकों का अपना अनुवाद दिया है (जिसे "चैतन्य भागवत 2.9.223-5" के रूप में उद्धृत किया गया है)। उसमें शब्द अलग हैं, पर भाव वही है।
अध्याय 5
विरासत और स्मरण
एक निर्धन केला-विक्रेता का श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ सम्बन्ध किस प्रकार उनके नवद्वीप के वर्षों से भी आगे तक बना रहा, और आज भी उसे किस प्रकार स्मरण किया जाता है।

श्रीधर की कथा उस रात के साथ ख़त्म नहीं होती, जब उन्हें बताया गया कि वे कृष्ण के सेवक हैं। श्री चैतन्य-चरितामृत आदि-लीला 10.67 का तात्पर्य बताता है कि आगे क्या हुआ। स्थानीय क़ाज़ी ने सामूहिक कीर्तन पर रोक लगा रखी थी। श्री चैतन्य महाप्रभु ने खुलकर उस रोक को नहीं माना और अपना सार्वजनिक संकीर्तन-अभियान शुरू किया। तब श्रीधर भी सबके साथ आनन्द से सड़कों पर नाचे। प्रभु सन्न्यास लेकर अपनी माता शची का घर हमेशा के लिए छोड़ने वाले थे। उससे पहले श्रीधर ने अपने ही बाग़ से एक कुम्हड़ा भेजा, ताकि माता शची उसे पका सकें। यह एक छोटी-सी, काम की भेंट थी, ऐसे व्यक्ति की ओर से जिनके पास देने के लिए और लगभग कुछ नहीं था। और जब श्री चैतन्य महाप्रभु बंगाल छोड़कर जगन्नाथ पुरी चले गए, तो श्रीधर पीछे नहीं रुके। तात्पर्य के अनुसार, वे हर साल केवल प्रभु को दोबारा देखने के लिए पुरी जाते थे। श्रीधर ने वर्षों तक प्रभु से केले के पत्तों को लेकर मोल-भाव किया था। जब वे समझ गए कि वे किससे मोल-भाव कर रहे थे, तब उन्होंने जीवन-भर उस सम्बन्ध को अपने ढंग से और अपने ही ख़र्च पर निभाया।
वह मन्दिर जहाँ कभी उनका घर था #
शताब्दियों बाद श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर ने श्रीधर के पुराने घर के स्थान पर एक छोटा मन्दिर बनवाया। यह भूमि आज भी श्रीधर आंगन के नाम से जानी जाती है। श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर श्रील प्रभुपाद के गुरु थे। श्री चैतन्य महाप्रभु की नवद्वीप-लीला के पवित्र स्थलों को फिर से खोजने और चिह्नित करने का सबसे बड़ा श्रेय उन्हीं को जाता है। यह मन्दिर कोई भव्य स्मारक नहीं था। यह बस एक चिह्न था, जो इसलिए बनाया गया ताकि प्रभु के जीवन में एक निर्धन केला-विक्रेता की भूमिका भुला न दी जाए। उनके बारे में बाकी लगभग कुछ भी दर्ज नहीं हुआ: न उनका जन्म-वर्ष, न उनका परिवार, और अधिकांश वृत्तान्तों में उनकी मृत्यु का वर्ष भी नहीं। वह मन्दिर आज भी वहाँ खड़ा है। मायापुर और नवद्वीप की परिक्रमा में तीर्थयात्री जिन अनेक स्थानों पर रुकते हैं, उनमें यह भी एक है।
श्रील प्रभुपाद ने जिसे सुरक्षित रखा #
श्री चैतन्य-चरितामृत आदि-लीला 10.67 पर श्रील प्रभुपाद का अपना तात्पर्य श्रीधर की निर्धनता पर कोई उपदेश नहीं देता। यह उससे कोई सीधी शिक्षा भी नहीं निकालता। यह बस वे तथ्य बताता है जिन्हें परम्परा ने सुरक्षित रखा है: उनकी आय का आधा-आधा बँटवारा, प्रभु का दैनिक हँसी-मज़ाक, टूटा लोहे का घड़ा, शची के लिए भेजा गया कुम्हड़ा, पुरी की वार्षिक यात्राएँ, और कृष्ण के ग्वाल-सखा कुसुमासव के रूप में उनकी पूर्व पहचान। यह इन तथ्यों को अपने आप बोलने देता है। कथा कहने का यह सीधा ढंग स्वयं भी कुछ कहता है। यह ग्रन्थ बाकी हर जगह अपनी बताई हर लीला के पीछे का दर्शन समझाता है। लेकिन यहाँ श्रीधर की कथा को जैसी है, वैसी ही रहने दिया गया है। यह एक अत्यन्त निर्धन व्यक्ति का सीधा-सादा वृत्तान्त है, जिनसे परम भगवान ने हर दिन मिलना चुना। ग्रन्थ यह नहीं बताता कि क्यों।
एक भक्त, जिनके गुरु का उल्लेख नहीं मिलता #
हमें मिले स्रोतों में श्रीधर के किसी दीक्षा-गुरु या शिक्षा-गुरु का नाम नहीं मिलता, और यह पृष्ठ अनुमान से कोई नाम नहीं जोड़ता। स्रोत जो बताते हैं, वह है श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ उनका घनिष्ठ, व्यक्तिगत सम्बन्ध। इस बात में वे हरिदास ठाकुर जैसे हैं, जो प्रभु के एक और अत्यन्त प्रिय भक्त थे। प्रभु हरिदास से किसी सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण नहीं, बल्कि उनकी भक्ति की सीधी, अखण्ड निष्ठा के कारण प्रेम करते थे। श्री चैतन्य महाप्रभु की दृष्टि में इन दोनों के लिए निर्धनता और निम्न सामाजिक स्थिति कभी बाधा नहीं बनी। बल्कि परम्परा इन दोनों को इसीलिए स्मरण करती है कि प्रभु को अर्पित करने के लिए उनके पास उस निष्ठा के सिवा और कुछ नहीं था।
इस अध्याय के शास्त्र प्रमाण (1)
khola-veca sridhara prabhura priya-dasa
yanha-sane prabhu kare nitya parihasa
उनतीसवीं शाखा श्रीधर थे, केले के वृक्ष की छाल के व्यापारी। वे प्रभु के अत्यन्त प्रिय सेवक थे। अनेक अवसरों पर प्रभु ने उनके साथ विनोद किया।
तात्पर्य से: तात्पर्य का अंश: "श्रीधर एक निर्धन ब्राह्मण थे जो कप बनाने के लिए केले के वृक्ष की छाल बेचकर जीवन-निर्वाह करते थे। वे अपनी आय का पचास प्रतिशत गंगा-पूजन में व्यय करते थे, तथा शेष भाग अपने भरण-पोषण में काम लेते थे।"
यह वृत्तान्त सीधे इसी तात्पर्य के बारे में है। श्रील प्रभुपाद ने श्रीधर की निर्धनता, उनके गंगा-व्रत, प्रभु के साथ रोज़ के हँसी-मज़ाक, और कुसुमासव के रूप में उनकी पूर्व पहचान को लिखा है, पर इन पर कोई उपदेश नहीं दिया। उन्होंने एक निर्धन व्यक्ति की भक्ति के तथ्यों को अपने आप बोलने दिया है।
- Sri Chaitanya-caritamrta, Adi-lila 10.67-68
- Sri Chaitanya-Bhagavata, Madhya-khanda, Chapter 9 (translated by Bhumipati Dasa)
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