श्री खोलावेचा श्रीधर
नवद्वीप के खोला-विक्रेता
अन्य नाम श्रीधर पण्डित, खोलावेचा श्रीधर, कोलावेचा श्रीधर, श्रीधर पण्डित
“जिस ब्राह्मण ने बलपूर्वक मेरे केले के पत्ते छीन लिए, वही जन्म-जन्मान्तर मेरे प्रभु हों। जिस ब्राह्मण ने सदैव मुझसे झगड़ा किया, उन्हीं के चरण-कमलों की सेवा में मैं सदा संलग्न रहूँ।”
श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपना चतुर्भुज कृष्ण-बलराम स्वरूप दिखाकर जब श्रीधर से मनचाहा वर माँगने को कहा, तब श्रीधर ने यह निवेदन किया (श्री चैतन्य-भागवत, मध्य-खण्ड 9.224-225, भूमिपति दास द्वारा अनूदित)।
खोलावेचा श्रीधर का अर्थ है "खोला बेचने वाला श्रीधर"। श्री चैतन्य महाप्रभु जिस समय स्वयं नवद्वीप में गृहस्थ जीवन जी रहे थे, उस समय श्रीधर वहाँ के सबसे निर्धन लोगों में गिने जाते थे। फिर भी वे प्रभु के सबसे प्रिय साथियों में से एक थे। वे खोला बेचकर किसी तरह अपना गुजारा करते थे। खोला केले के वृक्ष की छाल की पट्टियाँ होती हैं, जिनसे एक बार काम में आने वाले दोने बनते थे। साथ ही वे अपने छोटे-से बाग़ के केले के फूल, डंठल और फल भी बेचते थे। उनके पास लगभग कुछ भी नहीं था। उनका धातु का जलपात्र भी टूटा हुआ था। फिर भी युवा निमाई पण्डित, जिन्हें उस समय तक संसार श्री चैतन्य महाप्रभु के नाम से नहीं जानता था, हर दिन उनकी दुकान पर जाते, उनसे मोल-भाव करते और उनके टूटे लोहे के घड़े से जल पी लेते। यह उनका नित्य नियम बन गया था। हरिदास ठाकुर की तरह श्रीधर भी उन गिने-चुने भक्तों में हैं, जिन्हें परम्परा इसीलिए स्मरण करती है कि प्रभु को अर्पित करने के लिए उनके पास कोई सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं थी। उनके पास केवल अखण्ड, एकनिष्ठ भक्ति थी। और अन्त में श्री चैतन्य महाप्रभु ने उसी को सबसे अधिक मूल्यवान माना।
| विवरण | वर्णन |
|---|---|
| व्यवसाय | खोला (केले के वृक्ष की छाल, जिससे एक बार काम में आने वाले दोने बनते थे) तथा अपने बाग़ की केले की उपज (फूल, डंठल, फल) बेचना |
| निवास | नवद्वीप में, मायापुर के निकट, उस स्थान पर जो बाद में श्रीधर आंगन कहलाया |
| अन्य नाम | श्रीधर पण्डित, खोलावेचा श्रीधर, कोलावेचा श्रीधर |
| नित्य नियम | अपने ऊपर कुछ भी खर्च करने से पहले दिन-भर की कमाई का आधा भाग माता गंगा की पूजा में अर्पित करना |
| सबसे प्रसिद्ध लीला | श्री चैतन्य महाप्रभु का प्रतिदिन उनकी वस्तुओं पर मोल-भाव करना और उनके टूटे लोहे के घड़े से जल पीना; अन्त में महाप्रभु ने उन्हें अपना कृष्ण-बलराम स्वरूप दिखाया |
| पहचान | कुसुमासव, व्रज में कृष्ण को हँसाने वाले ग्वाल-सखा (गौर-गणोद्देश-दीपिका 133; चैतन्य-चरितामृत आदि 10.67 तात्पर्य) |
| विरासत | श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर के निर्देशन में बना श्रीधर आंगन का मन्दिर आज भी मौजूद है, और मायापुर परिक्रमा में भक्त इसके दर्शन करने जाते हैं |
नवद्वीप में एक निर्धन का व्यवसाय #
श्रीधर अपनी जीविका ठीक उसी तरह चलाते थे जैसे किसी नदी-किनारे के नगर का कोई भी निर्धन व्यापारी चलाता। वे अपने केले के वृक्षों की छाल, पत्ते और उपज इकट्ठा करते, और उन्हें नवद्वीप के बाज़ार में बेचने ले जाते, उसी स्थान पर जो आज श्रीधर आंगन के नाम से जाना जाता है। श्री चैतन्य-चरितामृत उन्हें बस "एक निर्धन ब्राह्मण" कहता है, जो प्याले बनाने के लिए केले के वृक्ष की छाल बेचता था (आदि 10.67)। न कोई उपाधि, न कोई विशेष पहचान, केवल भक्तों की एक लम्बी सूची में एक नाम। इसके अलावा सभी स्रोत एक बात पर सहमत हैं, और वह है उनकी निर्धनता। टूटी और टपकती छत वाली एक झोंपड़ी, पीतल का कोई बर्तन नहीं, और जल पीने के लिए दरार पड़ा एक लोहे का घड़ा। उनके व्यवसाय और उनकी परिस्थितियों का अधिक विस्तृत चित्र नवद्वीप में एक निर्धन भक्त का जीवन पृष्ठ में मिलता है।
उसी श्लोक (आदि 10.67) के अपने तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद बताते हैं कि कृष्ण की अपनी लीला में श्रीधर कौन थे। वे कवि-कर्णपुर की गौर-गणोद्देश-दीपिका (श्लोक 133) उद्धृत करते हैं:
खोलावेचतया ख्यातः पण्डितः श्रीधरो द्विजः ।
आसीद्व्रजे हास्यकारी यो नाम्ना कुसुमासवः ॥
"जो ग्वालबाल कृष्ण-लीला में कुसुमासव के नाम से जाने जाते थे, वही बाद में नवद्वीप में चैतन्य महाप्रभु की लीला में खोलावेचा श्रीधर बने।" (गौर-गणोद्देश-दीपिका 133, श्रील प्रभुपाद द्वारा चैतन्य-चरितामृत आदि 10.67 के तात्पर्य में अनूदित)
यह श्लोक उन्हें हास्य-कारी कहता है, अर्थात् वह ग्वालबाल "जो व्रजभूमि में भगवान कृष्ण से हँसी-ठिठोली करते और उन्हें हँसाते थे" (गौर-गणोद्देश-दीपिका 133)। यही विनोद-भरी मित्रता नवद्वीप में फिर दिखाई देती है, जब प्रभु रोज़ उनकी दुकान पर मोल-भाव करते थे।
सबसे पहले निभाया जाने वाला व्रत #
श्रीधर दिन-भर में जो भी थोड़ी-बहुत कमाई करते, उसका आधा भाग गंगा-पूजन में अर्पित कर देते थे। यह वे अपनी किसी भी आवश्यकता पर एक पैसा खर्च करने से पहले करते थे। श्रील प्रभुपाद ने इस नियम को चैतन्य-चरितामृत आदि-लीला 10.67 के अपने तात्पर्य में साफ़ शब्दों में दर्ज किया है। सामान्य दृष्टि से यह कोई बड़ी भेंट नहीं थी। लेकिन यह भेंट हर दिन, बिना चूके, सबसे पहले दी जाती थी। और वह भी ऐसी आय में से, जो पहले से ही इतनी कम थी कि उनके पास लगभग कुछ नहीं बचता था। उस व्रत का वास्तविक अर्थ क्या था, और उनके पड़ोसियों ने उनके रात में जागने का असली कारण कैसे गलत समझ लिया, यह गंगा के प्रति नित्य व्रत में बताया गया है।
पूरा मूल्य न चुकाने वाले प्रभु #
हर दिन युवा निमाई पण्डित श्रीधर की दुकान पर आते। वे उनके केले के पत्तों, फूलों और डंठलों में से जो चाहते ले लेते, और मोल-भाव करके मूल्य आधे या उससे भी कम पर उतरवा लेते। फिर उनके टूटे लोहे के घड़े से यूँ जल पी लेते मानो यह सबसे स्वाभाविक बात हो। श्रीधर बार-बार ऊँचे स्वर में विरोध करते, "यदि मेरा मूल्य पसन्द नहीं तो कहीं और जाकर पत्ते खरीदो," फिर भी उन्होंने कभी उन्हें मना नहीं किया। श्री चैतन्य-चरितामृत इस नियमित घटना को एक ही श्लोक में दर्ज करता है (आदि 10.68)। श्री चैतन्य-भागवत दोनों के बीच चलने वाले इस विनोदपूर्ण विवाद का कहीं अधिक विस्तृत और रोचक वर्णन देता है। इसका पूरा विवरण, और बाद की कथाओं में इसमें कभी-कभी हुए बदलाव, जलपात्र के लिए महाप्रभु की लीला में दिए गए हैं।
स्वरूप का प्राकट्य, और केवल एक निवेदन #
इस हँसी-मज़ाक के पीछे केवल स्नेह नहीं था, उसका एक गहरा प्रयोजन भी था। श्री चैतन्य-भागवत के अनुसार, एक बार रात-भर महान भाव-आवेश चलता रहा। उसी समय श्री चैतन्य महाप्रभु ने श्रीधर को अपना चतुर्भुज कृष्ण-बलराम स्वरूप दिखाया। कुछ वृत्तान्त यह घटना श्रीवास ठाकुर के घर पर हुई बताते हैं। प्रभु ने श्रीधर से मनचाहा वर माँगने को कहा। वे उन्हें आठों योग-सिद्धियाँ तक देने को तैयार थे। लेकिन वर्षों के हँसी-मज़ाक के कारण श्रीधर अब भी सावधान थे, इसलिए उन्होंने इनमें से कुछ भी नहीं माँगा। उन्होंने केवल इतना माँगा कि जिस ब्राह्मण ने वर्षों तक उन्हें कम मूल्य दिया और उनके केले के पत्ते चुराए, वही जन्म-जन्मान्तर तक उनके प्रभु बने रहें। इस प्राकट्य और वर की पूरी कथा महाप्रकाश और श्रीधर का वर में बताई गई है।
प्रभु के चले जाने के बहुत बाद तक स्मरण #
प्रभु के नवद्वीप छोड़ने के बाद भी श्रीधर श्री चैतन्य महाप्रभु के जीवन से दूर नहीं हुए। जब महाप्रभु ने संकीर्तन पर स्थानीय क़ाज़ी की लगाई रोक को खुलकर नहीं माना, तब श्रीधर भी सड़कों पर नाचे। प्रभु के सन्न्यास लेने से पहले उन्होंने माता शची के लिए भोजन-सामग्री भेजी, ताकि वे उसे पका सकें। और उसके बाद वे हर साल केवल प्रभु को फिर से देखने के लिए जगन्नाथ पुरी जाते रहे। शताब्दियों बाद श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर ने उनके पुराने घर के स्थान पर एक छोटा मन्दिर बनवाया। इस तरह एक निर्धन खोला-विक्रेता का नाम सदा के लिए उस भूमि से जुड़ गया, जिस पर वे कभी खड़े हुआ करते थे। यह स्मृति आगे कैसे बढ़ती गई, यह विरासत और स्मरण में बताया गया है।

शास्त्र प्रमाण
ऊपर पाठ में उद्धृत:
- Verse 133 Gaura-ganoddesha-dipika ऊपर देखें ↑
- Sri Chaitanya-caritamrta, Adi-lila 10.67-68
- Sri Chaitanya-Bhagavata, Madhya-khanda, Chapter 9 (translated by Bhumipati Dasa)
- Gaudiya History: Kholavecha Shridhara - Biography
- Gaudiya History: Sri Kholaveca Sridhara
- ISKCON Bangalore: Kholavecha Sridhara - Dear Devotee of Lord Chaitanya Mahaprabhu
- ISKCON Desire Tree: Kolavecha Sridhara Angana
- Vine of Devotion: Mahaprabhu's Love for the Unseen Devotee (Part One)
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री खोलावेचा श्रीधर का जन्म कब हुआ था?
श्री खोलावेचा श्रीधर का प्राकट्य तिथि दर्ज नहीं है (वे सोलहवीं शताब्दी के आरम्भ में, नवद्वीप में श्री चैतन्य महाप्रभु के गृहस्थ-जीवन के समय थे) में, नवद्वीप, बंगाल — वह स्थान जो बाद में श्रीधर आंगन के नाम से जाना गया, मायापुर के निकट में हुआ।
श्री खोलावेचा श्रीधर का तिरोभाव कब और कहाँ हुआ?
श्री खोलावेचा श्रीधर का तिरोभाव उपलब्ध स्रोतों में तिथि दर्ज नहीं है, उपलब्ध स्रोतों में अभिलिखित नहीं है में हुआ।
श्री खोलावेचा श्रीधर की प्रमुख लीलाएँ कौन-सी हैं?
यहाँ इन लीलाओं पर पृष्ठ उपलब्ध हैं: नवद्वीप में एक निर्धन भक्त का जीवन, गंगा के प्रति नित्य व्रत, जलपात्र के लिए महाप्रभु की लीला, महाप्रकाश और श्रीधर का वर, विरासत और स्मरण।








