आमि तो’ स्वानन्द सुखद बासी
मैं स्वानन्द सुखद कुंज की निवासिनी हूँ, और श्री श्री राधिका-माधव के चरणों की दासी हूँ।
जब राधा-माधव मिलते हैं, तब मैं आनंदित होती हूँ। जब वे बिछुड़ते हैं, तब मैं दुख से मरने लगती हूँ।
मैं सखी-स्थली की ओर आँख उठाकर कभी नहीं देखती। यदि देख भी लूँ, तो मुझे शैव्या का स्मरण हो आता है।
चंद्रावली की जो भी सखियाँ प्रतिकूल हैं, उन्हें देखकर मेरे हृदय को पीड़ा होती है।
वे सदा राधा के हरि को छीनकर ले जाना चाहती हैं, और राधा के कुंज को अंधकार से ढँक देना चाहती हैं।
श्री राधा और श्री गोविंद के मिलन के सुख के जो विरोधी हैं, उनका मुख मैं कभी नहीं देखती।
जो राधा के प्रतिकूल हैं, उनसे बात करने की इच्छा मेरे मन में कभी नहीं होती।
भक्तिविनोद ने श्री राधा के चरणों में अपना हृदय बड़ी सावधानी से समर्पित कर दिया है।