केशव! तुवा जगत विचित्र
हे केशव! आपकी यह सृष्टि अत्यन्त विचित्र है। अपने कर्मों के फलस्वरूप मैं इस जन्म-मृत्यु के वन में भटकता रहा हूँ, और यहाँ अनेक प्रकार के छलावे देखे हैं।
आपके चरणों को भूलने के कारण मैं मरते दम तक पीड़ा भोगता हुआ, दुःख की आग में जलता रहता हूँ। इसी बीच कपिल, पतञ्जलि, गौतम, कणभोजी, जैमिनि और बौद्ध, ये सब अपने-अपने मत लेकर मेरी ओर दौड़े आते हैं।
वे अपने-अपने मत के अनुसार आपके नाम का सहारा लेकर मुझे भोग या मोक्ष स्वीकार करने के लिए विविध प्रकार के जाल बिछाते हैं। वे सब छलिया हैं, भक्ति से विमुख हैं, और वे केवल घोर भ्रम उत्पन्न करते हैं।
ये सब योद्धा आपसे विमुख लोगों को ठगने के लिए तरह-तरह की दुकानें खोलकर बैठे हैं। भक्तिविनोद उन्हें दूर से ही प्रणाम करके, आपके भक्तों के चरणों को ही अपना सर्वस्व मान लेते हैं।
इस भजन के बारे में
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- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
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ऑडियो के लिए आभार: इस्कॉन डिज़ायर ट्री। सभी भक्त गायकों की जय।