दारा पुत्र निज देहो कुटुम्ब पालने
पत्नी, संतान, अपने शरीर और परिजनों के पालन-पोषण की चिंता मुझे मन में सदा घेरे रहती थी।
मैं धन कैसे कमाऊँ? यश कैसे पाऊँ? अपने बेटे-बेटियों का विवाह कैसे करूँ?
अब अपने आपको समर्पित कर देने के बाद मुझे और कोई चिंता नहीं है। हे प्रभु! अब यह घर-परिवार आपका ही है, और आप ही इसका पालन करेंगे।
आप मुझे अपना सेवक जानकर अवश्य ही मेरा पालन करेंगे। हे प्रभु! आपकी सेवा में मुझे सबसे बड़ा सुख मिलता है।
हे प्रभु! सारा कार्य आपकी ही इच्छा से होता है, फिर भी जीव सोचता है 'यह मैं करता हूँ'। परन्तु यह बात सत्य नहीं है।
यदि आप स्वयं न करें, तो जीव क्या कर सकता है? जीव केवल इच्छा कर सकता है, और सिद्ध वही होता है जो आपकी इच्छा हो।
निश्चिन्त होकर अब मैं आपकी सेवा करूँगा। आपके घर में जो भी अच्छा या बुरा हो, उसकी ज़िम्मेदारी मुझ पर नहीं है।
अपनी स्वतंत्रता को त्यागकर, पूरी तरह अकिंचन होकर भक्तिविनोद आपके चरणों की सेवा करता है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- शरणागति
- भाव
- पद
- 8