Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

जगरनद् अथ कुञ्ज वरे

टेक
मम धीर् मज्जति कंस-हरे मौलि-शिखोपरि-पिञ्छ-धरे
अर्थ

मेरा मन अब मोरपंख का मुकुट धारण करने वाले, कंस का संहार करने वाले कृष्ण के चिन्तन में लीन हो गया है।

जगरनद् अथ कुञ्ज-वरे वीक्षित-भस्कर-रुचि-निकरे कन्त-निद्र-भङ्ग-करे अपि सङ्कलित-स्व-परिकरे
अर्थ

सुन्दर कुंज में प्रभात की चमकती सूर्य-किरणों को देखकर कृष्ण जाग उठते हैं और अपनी प्रियतमा की नींद तोड़ते हैं, तब प्रियतमा की गोपी-सखियाँ दोनों के चारों ओर इकट्ठी हो जाती हैं।

मुहुर् उल्लसित-युवति-निकरे समम् अन्य बहिर् अन्य-चरे घन-गहनध्वनि गमन-परे तत्र च बहु-कृत-सुख-वितरे अश-स्तम्भित-विरह-गरे धम्नि सनतन-शर्म-हरे
अर्थ

युवा गोपियाँ बार-बार उन्हें प्रसन्न करती हैं और घने वन के मार्ग पर उन्हें आगे ले चलती हैं। वन में उन्हें बहुत सुख मिला, पर घर में उनका नित्य सुख छिन जाता है। घर में उन्हें प्रियतम के वियोग के विषैले सर्प ने डस लिया है, और अब उनसे मिलने की इच्छा से वे स्तब्ध हैं।

इस भजन के बारे में

पद
3