नीर धर्म गत जाह्नवी सलिले
हे हरि! गंगा के जल में कीचड़ और फेन दिखते हैं, जो जल में स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होते हैं। फिर भी गंगा का जल अपनी चिन्मय प्रकृति को कभी नहीं छोड़ता।
इसी प्रकार वैष्णव का शरीर सदा अप्राकृत है, प्रकृति के नियमों से परे है। यद्यपि किसी वैष्णव की जन्मजात प्रकृति या देह में दोष दिखाई दे, तो भी वैष्णव कभी भौतिक नहीं होता। जो कोई फिर भी वैष्णव की निंदा करता है, वह घोर पाप में गिरता है।
उस अपराध के कारण जीव निरंतर यमराज की यातना पाता है। हे नन्द-नन्दन! उस अपराध के कारण मैं कभी नष्ट न होऊँ।
तेरे वैष्णव तेरा ही ऐश्वर्य हैं। वे मुझ पर कृपा करें, तो मेरी गति तेरी ओर होगी, और मैं तेरे चरणों की छाया पाऊँगा।
इस भजन के बारे में
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- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
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