राधे! चल तोमा दुँहे हिन्दोले वसाञा
हे राधे! चलिए, आप दोनों को झूले पर बिठाकर हम सब बड़े यत्न से झुलाएँगी। वह शोभा देखकर हम आनन्द में मतवाली हो जाएँगी। तब अनंग-मंजरी "जय राधे!" कहकर कुमकुम और कस्तूरी से भरी पिचकारी कृष्ण को देंगी। पिचकारी लेकर हरि खेलेंगे, पर अन्त में उनकी हार होगी।
"राधा इस वन की स्वामिनी हैं; मैं इस वन में उनका कोतवाल बनकर रहूँगा।" ऐसा कहकर हरि विनय से कोतवाल बनकर खड़े हो जाएँगे।
उस लीला के बाद आप प्रेम से कृष्ण को अपने वक्ष से लगा लेंगी। ललिता और विशाखा सहायता करेंगी, और मैं मर्यादा के अनुसार सेवा में रहूँगी।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- सेवा लालसा
- भाव
- पद
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