राधे! कृष्णेर उद्देशे यबे गेनु मोरा
हे राधे! (समाचार सुनिए) जब हम कृष्ण को खोजने गईं, तब धनिष्ठा वन में आईं और स्वादिष्ट फलों का रस और अच्छे व्यंजन लाकर बड़े यत्न से कृष्ण को दिए।
रस पीकर बलदेव बोले, "तुम गौओं के रखवालों को सँभालो। सब सखा तुम्हारी सेवा करेंगे, और मैं थोड़ी देर के लिए आगे चला जाऊँगा...
"...वन-वन, पेड़-पेड़ के नीचे घूमकर मैं प्रकृति की शोभा देखूँगा। निर्जन कानन में मुझे बड़ा सुख मिलता है, जो मुनियों के मन को भी लुभाता है...
"...मध्याह्न ढलते ही मैं अवश्य तुम्हारे पास लौट आऊँगा। सबको लेकर हम गोष्ठ चलेंगे, और तुम सींग बजाना।"
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
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- सेवा लालसा
- भाव
- पद
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