राधे! नन्दीश्वर याइते पथे नाना कथा
हे राधे! नन्दीश्वर जाते हुए राह में तरह-तरह की बातें होती हैं और कुन्दलता हँसी-ठिठोली करती हैं। सब परम आनन्द से चलती जाती हैं, और मैं धुले वस्त्र उठाकर ले चलूँगी।
मैं रसोई के मसाले, हींग और जीरा भी साथ ले चलूँगी, जिनसे आपके कृष्ण प्रसन्न होते हैं। कुछ ही देर में हम नन्दीश्वर पहुँच जाएँगी।
द्वार पर मैं आपके दोनों चरण धोऊँगी और अपने केशों से उन्हें पोंछूँगी। फिर यशोदा के पास जाकर बड़ी विनय से उन्हें प्रणाम करूँगी।
यशोदा स्नेह से मुझे गोद में लेकर आदर से उठा लेंगी। फिर रोहिणी के साथ रसोई में जाकर भोजन बनाने का काम होगा।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- सेवा लालसा
- भाव
- पद
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