Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

स त्वर प्रसर वत् त्व् असत्त्व धम हयिनी

स-त्वर-प्रसर-वत् त्व् असत्त्व-धम-हयिनी सर्व-गुर्व्-अहर्य-कुट-वरनति-ययिनी
अर्थ

कृष्ण की बाँसुरी की ध्वनि सुनकर गोपियाँ तुरन्त अपने निर्जीव घरों को छोड़कर चल पड़ीं। जब उनके बड़ों ने द्वार रोका, तब भी वे निकल गईं।

नथम् एकम् अन्व् अनेक-दर-सम्पद्-अर्पिणी ओघ-मोघम् अन्व् अनन्त-भक्त-लोक-तर्पिणी
अर्थ

कृष्ण को अपना एकमात्र पति मानकर प्रत्येक गोपी ने उन्हें ऐसा ऐश्वर्य और सुख अर्पित किया, मानो वह एक नहीं, अनेक पत्नियों का समूह हो। प्रत्येक गोपी ने उन्हें ऐसे प्रसन्न किया, मानो वह असंख्य भक्त-सेवकों का ऐसा समूह हो, जो समुद्र को भी फीका कर दे।

लोल-केश-शैवलञ्चि-कर्ण-पुर-चक्रिणी पुष्प-जत-निष्प्रपत-शुभ्र-फेन-चक्रिणी
अर्थ

गोपियों के उस सागर में लहराती केश-लटें शैवाल थीं, सुन्दर कर्ण-कुण्डल भँवर थे और फूलों के गहने सफ़ेद झाग थे।

उच्छलन्-नवीन-मीन-नेत्र-नीर-गत्रिणी अग्रिमध्व-मत्र-पत्र-सम्मुखनुयत्रिणी
अर्थ

कृष्ण से मिलने के लिए मार्ग पर दौड़ती हुई उन गोपियों के अंग जल की धाराएँ थे और उनके नयन तैरती हुई नन्ही मछलियाँ।

मन्द-तल-बहु-नल-पणि-पद्म-शलिनी अच्छ-बल-कच्छपङ्ग-वत्स-जन्म-जलिनी
अर्थ

वहाँ के कमल-पुष्प गोपियों के हाथ थे और कमल-नाल उनकी सुन्दर भुजाएँ। सुन्दर नन्हे कछुए उनके वक्ष थे।

जुति-दुति-कृत्-कटीर-तीर-धीर-गमिनी उरु-भुरुहलि-पट-सम्प्रपत-कमिनी
अर्थ

उनकी कमर तेज़ी से हिल रही थी और वे दौड़कर यमुना के तट पर पहुँचीं। वे विशाल वन में प्रवेश करना चाहती थीं।

कञ्चि-कञ्चि-कङ्कनदि-शिञ्ज-दम्भ-सञ्जिनी प्रयसस् तु हंस-सङ्घ-शब्दितनु-रञ्जिनी
अर्थ

उनके खनकते कंगन, घुँघरू और दूसरे गहने हंसों के कलरव जैसे बज रहे थे।

तुर्न-तुर्न-घुर्ननदि-सङ्कुलङ्ग-नर्तिनी पुर्ण-पुर्ण-भव-गुर्ण-जड्य-जत-वर्तिनी
अर्थ

उनका व्याकुल होकर दौड़ना ही नृत्य था। प्रेम के आवेश से उनके अंग स्तब्ध हो गए थे।

वेश-वस्त्र-सन्निवेश-चञ्चलत्व-भङ्गिनी तत्-तद्-अर्थ-वैपरीत्य-करि-वेग-सङ्गिनी
अर्थ

जल्दी में उन्होंने अपने वस्त्र और गहने ग़लत स्थानों पर पहन लिए।

यन्-निमित्तम् अत्म-सर्व-सङ्ग-भङ्ग-भविनी यत्र सर्व-नम-रुप-विस्मृतिश् च भविनी
अर्थ

उन्होंने घर के सब सम्बन्धियों से अपने सारे नाते तोड़ दिए। कृष्ण के प्रेम के आवेश में वे अपने सम्बन्धियों के नाम और रूप तक भूल गईं।

श्यम-धम-सुष्ठु-रमम् एतम् अत्र सद्-धवम् सिन्धु-तुल्यम् उत्तरङ्गद्-अङ्गम् अशु मधवम्
अर्थ

वहाँ उनके नित्य पति कृष्ण थे, जो उमड़ती लहरों वाले सुन्दर श्याम सागर के समान थे।

पुर्व-पुर्व-भिन्न-यतिर् उत्तरप्त-सङ्गतिः अपगलि-सम्मितप सेयम् अलि-संहतिः
अर्थ

गोपियाँ अनेक नदियाँ थीं, जो कृष्ण-रूपी सागर में समा रही थीं।

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पद
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