स त्वर प्रसर वत् त्व् असत्त्व धम हयिनी
कृष्ण की बाँसुरी की ध्वनि सुनकर गोपियाँ तुरन्त अपने निर्जीव घरों को छोड़कर चल पड़ीं। जब उनके बड़ों ने द्वार रोका, तब भी वे निकल गईं।
कृष्ण को अपना एकमात्र पति मानकर प्रत्येक गोपी ने उन्हें ऐसा ऐश्वर्य और सुख अर्पित किया, मानो वह एक नहीं, अनेक पत्नियों का समूह हो। प्रत्येक गोपी ने उन्हें ऐसे प्रसन्न किया, मानो वह असंख्य भक्त-सेवकों का ऐसा समूह हो, जो समुद्र को भी फीका कर दे।
गोपियों के उस सागर में लहराती केश-लटें शैवाल थीं, सुन्दर कर्ण-कुण्डल भँवर थे और फूलों के गहने सफ़ेद झाग थे।
कृष्ण से मिलने के लिए मार्ग पर दौड़ती हुई उन गोपियों के अंग जल की धाराएँ थे और उनके नयन तैरती हुई नन्ही मछलियाँ।
वहाँ के कमल-पुष्प गोपियों के हाथ थे और कमल-नाल उनकी सुन्दर भुजाएँ। सुन्दर नन्हे कछुए उनके वक्ष थे।
उनकी कमर तेज़ी से हिल रही थी और वे दौड़कर यमुना के तट पर पहुँचीं। वे विशाल वन में प्रवेश करना चाहती थीं।
उनके खनकते कंगन, घुँघरू और दूसरे गहने हंसों के कलरव जैसे बज रहे थे।
उनका व्याकुल होकर दौड़ना ही नृत्य था। प्रेम के आवेश से उनके अंग स्तब्ध हो गए थे।
जल्दी में उन्होंने अपने वस्त्र और गहने ग़लत स्थानों पर पहन लिए।
उन्होंने घर के सब सम्बन्धियों से अपने सारे नाते तोड़ दिए। कृष्ण के प्रेम के आवेश में वे अपने सम्बन्धियों के नाम और रूप तक भूल गईं।
वहाँ उनके नित्य पति कृष्ण थे, जो उमड़ती लहरों वाले सुन्दर श्याम सागर के समान थे।
गोपियाँ अनेक नदियाँ थीं, जो कृष्ण-रूपी सागर में समा रही थीं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- जीव गोस्वामी · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- गोपाल-चम्पू
- पद
- 12