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“जय राधा माधव” के परिणाम

536 भजन · 902 पद भजन के शब्दों में · 608 पद अर्थ में

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2 पद भजन में 1 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतावली

  • पद 1भजन
    जय जशोदा-नन्दन कृष्ण गोपाल गोबिन्द
    जय मदन-मोहन हरे अनन्त मुकुन्द
  • पद 2भजन
    जय अच्युत माधब राम बृन्दाबन-चन्द्र
    जय मुरली-बदन श्याम गोपी-जनानन्द
  • पद 2अर्थ
    हे कभी न चूकने वाले प्रभु (अच्युत), हे लक्ष्मी के पति (माधव), हे सर्वोच्च भोक्ता (राम), हे वृन्दावन के चन्द्रमा (वृन्दावन-चन्द्र), आपकी जय हो! हे मुरली बजाने वाले (मुरली-वदन), हे श्यामसुन्दर (श्याम), हे गोपियों को आनन्द देने वाले (गोपी-जनानन्द), आपकी जय हो!
1 पद भजन में 2 पद अर्थ में

जयदेव गोस्वामी

  • पद 9भजन
    श्री-जयदेव-भणितम् इति गीतम्
    सुखयतु केशव-पदम् उपनीतम्
  • पद 1अर्थ
    राधा, हे कृष्ण! राधा! हे केशव, तुमसे बिछड़कर विरह में राधा की यह दशा है।
  • पद 9अर्थ
    श्री जयदेव द्वारा रचित यह गीत श्रोता को केशव के चरणों तक ले जाकर सुख प्रदान करे।
2 पद भजन में

नयनानन्द दास · गौड़ीय वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    जय रे जय रे गोरा श्री-शची-नन्दन
    मङ्गल नटन सुठान रे
    कीर्तन आनन्दे श्रीबास रामानन्दे
    मुकुन्द बासु गुण गान रे
  • पद 4भजन
    केह बोले गोर जानकी-बल्लभ
    राधार प्रिय पाञ्चबाण रे
    नयनानन्देर मने आन नाहि जाने
    आमार गदाधरेर प्राण रे
2 पद भजन में

परमानन्द दास · गौड़ीय वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    जय कृष्ण चैतन्य नित्यानन्द चन्द्र
    अद्वैत आचार्य जय गौर-भक्त-वृन्द
  • पद 7भजन
    राधे कृष्ण राधे कृष्ण राधे गोबिन्द
    श्री-राधा-रमण बन्दे ए परमानन्द
2 पद भजन में

शिवानन्द सेन

  • पद 1भजन
    जय जय पण्डित गोसाइ, जार कृपाबले से चैतन्य गुण गाइ
    हेन से गौरचन्द्रे जाहार पिरीति
  • पद 3भजन
    गदाइर गौराङ्ग गौराङ्गेर गदाधर, श्री राम जानकी जेन एक कलेबर
    जेन एक प्राण राधा वृन्दावन चन्द्र
2 पद भजन में

जयदेव गोस्वामी

  • पद 1भजन
    एहि मुरारे कुञ्जबिहारी
    एहि प्रणत तव बन्धो
    हे माधव मधु मथन वरेण्य
    केशव करुणा सिन्धो
  • पद 4भजन
    राधा रञ्जन कंस निषूदन
    प्रणतिस् तावक चरणे
    निखिल निराश्रय शरणे
    एहि जनार्दन पीताम्बर धर …
2 पद भजन में

रूप गोस्वामी

  • पद 1भजन
    जय जय जय गुञ्जावलि-मण्डित
    प्रणय-विशृङ्खल-गोपी-मण्डल-वर-
    बिम्बाधर-खण्डन-पण्डित
  • पद 2भजन
    स्फुरद्-इन्दीवर-निन्दि-कलेवर
    राधा-कुच-कुङ्कुम-भर पिञ्जर
    सुन्दर-चन्द्रक-चूड मनोहर
    चन्द्रावली-मानस-शुक-पञ्जर
4 पद भजन में 7

जय दास · गौड़ीय वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    जय शची-सुत गौर-हरि
    जय पाबन जय नदीया-बिहारी
  • पद 2भजन
    जय चापाल-गोपाल-मुक्ति-कारी
    जय जगाइ-माधाइ-दुष्कृति-हारी
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  • पद 3भजन
    जय अखिल-भुबन-त्राण-कारी
    जय दण्ड-कमण्डलु करोया धारी
  • पद 4भजन
    जय युगल-किशोर-रूप-धारी
    जय-दास मनोहर हृदय-बिहारी
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतावली

  • पद 1भजन
    राधा-बल्लभ माधब श्री-पति मुकुन्द
    गोपिनाथ मदन-मोहन रास-रसानन्द
    अनङ्ग-सुखद-कुञ्ज-बिहारी गोबिन्द
  • पद 1अर्थ
    हे राधा के प्रिय (राधा-वल्लभ), हे लक्ष्मी के पति (माधव और श्रीपति), हे मुक्ति देने वाले (मुकुन्द), हे गोपियों के स्वामी (गोपीनाथ), हे कामदेव से भी अधिक सुन्दर प्रभु (मदन-मोहन), हे रास-नृत्य के आनन्द-रस का सुख से आस्वादन करने वाले प्रभु (रास-रसानन्द), हे वन…
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में

श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 2भजन
    जय राधा-बल्लभ मुरली-अधर
    जय ब्रज-बिनोद प्रेम-सुधाकर
  • पद 2अर्थ
    जय हो, हे राधा के प्रिय, हे अधरों पर मुरली धारण करने वाले! जय हो, हे व्रज में लीला करने वाले! जय हो, हे प्रेम के अमृत-चन्द्र!
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में

रूप गोस्वामी

  • पद 4भजन
    स क्लेश-रहितो भूत्वा
    भूरि-सौभाग्य-भूषितः
    त्वरितं करुणा-पात्रं
    राधा-माधवयोर् भवेत्
  • पद 4अर्थ
    वह समस्त कष्टों से मुक्त होकर प्रचुर सौभाग्य से सुशोभित हो जाता है, और शीघ्र ही राधा-माधव दोनों की कृपा का पात्र बन जाता है।
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में

  • पद 5भजन
    राधारानी की जय महारानी की जय
    बोलो बरसानेवाली की जय जय जय
    वृषभानु दुलारी की जय जय जय
  • पद 5अर्थ
    राधारानी की जय! महारानी की जय! बरसाने वाली की जय जय जय बोलो! वृषभानु की दुलारी की जय जय जय!
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में

रूप गोस्वामी

  • पद 2भजन
    अधर-विराजित-मन्दतर-स्मित-लोभित-निज-परिवार
    चटुल-दृग्-अञ्चल-रचित-रसोच्चल-राधा-मदन-विकार
  • पद 3अर्थ
    (टेक) हे सुन्दर नन्दकुमार, हे वृन्दावन के सुगन्धित वन में वसन्त-लीला करने वाले प्रभु, आपकी जय हो! आपकी जय हो! (1)-(3) हे प्रभु, जिनके घुँघराले केश अनेक नई कलियों से सुशोभित हैं, हे प्रभु, जिन्हें प्रेमी सखाओं ने कुंकुम और कर्पूर-चूर्ण से अनुलिप्त किया है, हे…
2 पद भजन में 5 पद अर्थ में

श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    जय शिब सुन्दर बिश्व परात्-पर
    परमानन्दानन्द-कारी
  • पद 2भजन
    जय जय श्रील राम रघुनन्दन
    जनक-सुता-रति-कान्त
    सुर नर बानर खचर निशाकर
    यछु गुण गाय अनन्त
  • पद 1अर्थ
    जय हो, हे सुंदर मंगलमय प्रभु, हे लोकों में सबसे महान महापुरुष, हे आनंदमयों में परम आनंदमय!
  • पद 2अर्थ
    जय जय हो, हे सुंदर राम, हे रघुकुल के वंशज, हे जनकसुता (सीता) के प्रिय! देवता, मनुष्य, वानर, यक्षिणी और निशाचर दैत्यों पर की गई आपकी महिमामय कृपा का गान अनंत शेष स्वयं करते हैं!
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  • पद 3अर्थ
    जय हो, हे नवजलधर-श्याम सुंदर प्रभु, हे कमल-नयन, हे रणभूमि के वीर, हे बाएँ हाथ में धनुष और दाहिने हाथ में तीक्ष्ण बाण धारण करने वाले, हे करोड़ों समुद्रों से भी गहरे बुद्धिमान प्रभु!
  • पद 4अर्थ
    जय हो, हे प्रभु, जिनकी खड़ाऊँ को छोटे भाई भरत ने छत्र और चामर से पूजा, जिनके सामने शिव, ब्रह्मा, सनक, सनातन और सौ मुखों वाले अनंत हाथ जोड़कर खड़े रहते हैं!
  • पद 5अर्थ
    जय हो, हे भक्तों के आनंद, हे प्रभु, जिनके चरण-कमलों की सेवा हनुमान करते हैं! हे हरि! हे नारायण! हे परमेश्वर! गोविंद दास अपने हृदय में आपका ही चिंतन करते हैं।
2 पद भजन में 2 पद अर्थ में 10

भक्तिविनोद ठाकुर · वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    'राधा-कृष्ण' बोल् बोल् बोलो रे सोबाइ
    (एइ) शिखा दिया, सब् नदीया
    फिर्छे नेचे' गौर-निताइ
    (मिछे) मायार् बोशे, जाच्छो भेसे', …
  • पद 3भजन
    ('राधा) कृष्ण' बोलो, सङ्गे चलो,
    एइ-मात्र भिखा चाइ
    (जाय्) सकल्'बिपोद् भक्तिविनोद्
    बोले, जखोन् ओ-नाम् गाइ
  • पद 1अर्थ
    "राधा-कृष्ण" बोलो, बोलो, सब बोलो! यह शिक्षा देते हुए गौर-निताई सारे नदिया में नाचते हुए घूम रहे हैं। हे भाइयो, तुम व्यर्थ ही माया के वश में बहे जा रहे हो, कभी डूबते और कभी उभरते हुए।
  • पद 3अर्थ
    "राधा-कृष्ण" बोलो और साथ चलो, मेरी यही एक विनती है। भक्तिविनोद कहते हैं, "जब मैं यह नाम गाता हूँ, तो सारी विपदाएँ दूर हो जाती हैं।"
3 पद भजन में 3 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतावली

  • पद 1भजन
    जय जय हरि-नाम चिद्-आनन्दामृत-धाम
    पर-तत्त्व अखर-आकार
    निज-जने कृपा कोरि' नाम-रूपे अबतोरि'
    जीबे दोया कोरिले अपार
  • पद 2भजन
    जय हरि कृष्ण राम जग-जन-सु-बिश्राम
    सर्ब-जन-मानस-रञ्जन
    मुनि-बृन्द निरन्तर जे नामेर समादर
    कोरि' गाय भोरिया बदन
  • पद 1अर्थ
    हे हरि-नाम, हे चिदानन्द अमृत के धाम, हे अक्षरों के रूप में प्रकट परम सत्य, जय जय हो आपकी! हे प्रभु, अपने भक्तों पर कृपा करके आप नाम-रूप में इस जगत में अवतरित हुए। आप पतित जीवों को असीम कृपा देते हैं।
  • पद 2अर्थ
    "हे हरि! हे कृष्ण! हे राम! हे जगत के लोगों की शरण! हे हर हृदय के आनन्द! आपकी जय हो!" ऋषिगण मुँह भरकर इसी प्रकार नाम की उपासना और स्तुति करते हैं।
इस भजन में 2 और मिलान दिखाएँ
  • पद 5भजन
    तब स्वल्प-स्फूर्ति पाय उग्र-ताप दूरे जाय
    लिङ्ग-भङ्ग होय अनायासे
    भकतिबिनोद कोय जय हरि-नाम जोय
    पडे थाकि तुया पद आसे
  • पद 5अर्थ
    जब आप थोड़ा भी प्रकट होते हैं, तो सबसे भयानक कष्ट दूर भाग जाते हैं, और सूक्ष्म शरीर, जो आत्मा को इस संसार में बाँधे रखता है, सहज ही टूट जाता है। भक्तिविनोद कहते हैं, "हे हरि-नाम, आपकी जय हो! जय हो!" मैं आपके चरणों में आकर गिरता हूँ, और वहीं पड़ा रहता हूँ।
1 पद भजन में 2 पद अर्थ में 7

नरोत्तम दास ठाकुर · वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    राधा-कृष्ण प्राण मोर जुगल-किशोर
    जीवने मरणे गति आरो नाहि मोर
  • पद 1अर्थ
    राधा-कृष्ण युगल-किशोर ही मेरे प्राण हैं, जीवन हो या मृत्यु, उनके अतिरिक्त मेरा कोई और आश्रय नहीं है।
  • पद 5अर्थ
    ललिता-विशाखा आदि सभी सखियों की अनुमति से, मैं राधा-कृष्ण के चरण-कमलों की सेवा करूँगी।