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“जय राधा माधव” के परिणाम

536 भजन · 902 पद भजन के शब्दों में · 608 पद अर्थ में

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4 पद भजन में

दीन कृष्ण दास · गौड़ीय वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    जय जय महाप्रभु जय गौरचन्द्र
    जय जय बिश्वम्भर करुणार सिन्धु
  • पद 2भजन
    जय शची-सुत जय पण्डित निमा-इ
    जय मिश्र पुरन्दर जय शची मा-इ
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  • पद 3भजन
    जय जय नबद्वीप जय सुरधुनी
    जय लक्ष्मी बिष्णुप्रिया प्रभुर घरणी
  • पद 4भजन
    जय जय नबद्वीप-बासी भक्त-गण
    जय जय नित्यानन्द अद्वैत-चरण
4 पद भजन में

संकर्षण दास · गौड़ीय वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    श्री कृष्ण चैतन्य जय पतित-पाबन
    प्रकाशिल कलि-काले नाम-सङ्कीर्तन
  • पद 2भजन
    जय नित्यानन्द जय अधम-तारण
    दया बितरिले देखि दीन-हीन जन
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  • पद 3भजन
    जय अद्वैतचन्द्र भक्तेर जीबन
    आनिलेन गौरचन्द्र करि आकर्षण
  • पद 4भजन
    जय जय भक्त-बृन्द पारिषद-गण
    अधमे तारिले एबे तार सङ्कर्षण
4 पद भजन में

जीव गोस्वामी · गोपाल-चम्पू

  • पद 1भजन
    रध-रक-शशधर मुरली-कर गोकुल-पति-कुल-पल जय जय कृष्ण हरे
    रध-बध-मोचन मुख-रोचन विदलित-गोकुल-कल जय जय कृष्ण हरे
  • पद 2भजन
    रध-परिकर-पुण्यद नैपुण्यद गोकुल-रुचिषु विशल जय जय कृष्ण हरे
    रध-सुकृत-वशी-कृत मङ्गल-भृत-तिलकित-गोकुल-भल जय जय कृष्ण हरे
इस भजन में 2 और मिलान दिखाएँ
  • पद 3भजन
    रध-निज-गति-धर्मद पुरु-शर्मद हत-गोकुल-रिपु-जल जय जय कृष्ण हरे
    रध-जीवन-जीवन गो-व्रज-धन गोकुल-सरसि-मरल जय जय कृष्ण हरे
  • पद 4भजन
    रध-मोद-रसकर सरसिज-वर गोकुल-मण्डल-नल जय जय कृष्ण हरे
    रध-भुषण भुषण गत-दुषण गोकुल-हृदिल-भु-पल जय जय कृष्ण हरे
4 पद भजन में

सनातन गोस्वामी · कृष्ण-लीला-स्तव

  • पद 1भजन
    जय दानपति-ध्यात महा-महिम-सञ्चय
    सल्-लक्षणार्थ-सद्-भाग्याक्रूर-सम्भावितेक्षण
  • पद 3भजन
    जय दानपतीक्षाप्त क्षिति-कौतुक-कृत्-पद
    श्वाफल्कि-लुठनाधान-पदाम्बुज-रजो-व्रज
इस भजन में 2 और मिलान दिखाएँ
  • पद 4भजन
    जय श्वफल्क-तनय-नयनानन्द-वर्धन
    रथावप्लाविताक्रूर जयाक्रूराभिवन्दित
  • पद 5भजन
    सुप्रीत्यालिङ्गिताक्रूर जय प्रणत-वत्सल
    गान्दिनी-नन्दनाशेष-मनोवाञ्छित-पूरक
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में 10

भक्तिविनोद ठाकुर · शरणागति

  • पद 1भजन
    राधा-कुन्ड-तट-कुञ्ज-कुटीर्
    गोवर्धन-पर्वत, जामुन-तीर्
  • पद 1अर्थ
    राधा-कुण्ड के तट पर, कुंज में बना कुटीर... गोवर्धन पर्वत, यमुना का तट...
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में 7

भक्तिविनोद ठाकुर · वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    (किब) जय जय गोराचान्देर् आरतिको शोभा
    जाह्नवी-तट-वने जग-मन-लोभा
    जग-जन-मन-लोभा
    (फिर्स्त् रेफ्रैन्) …
  • पद 1अर्थ
    जय जय चैतन्य महाप्रभु की आरती की शोभा! यह गौर-आरती गंगा के तट पर एक वन में हो रही है और सारे जगत के मन को मोहित कर रही है।
2 पद भजन में 2 पद अर्थ में

श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    जय जय अदभुत सो पहुं अद्वैत
    सुरधुनी सन्निधाने
    आङ्खि मुदि रहे प्रेमे नदी बहे
    बसन तित्ल घामे
  • पद 4भजन
    जय सीता-नाथ करल बेकत
    नन्देर नन्दन हरि
    कहे बृन्दाबन अद्वैत-चरण
    हियार माझारे धरि
  • पद 1अर्थ
    अद्भुत अद्वैत प्रभु की जय जय हो! गंगा के तट पर बैठकर वे रोते हैं। उनके नेत्रों से प्रेम के अश्रुओं की नदी बहती है। उनके वस्त्र पसीने से भीग जाते हैं।
  • पद 4अर्थ
    अद्वैत प्रभु की जय हो! उन्हीं के कारण नन्द के पुत्र भगवान कृष्ण इस जगत में आए। वृन्दावन दास कहते हैं: मैं अपने हृदय में अद्वैत प्रभु के चरणों को धारण करता हूँ।
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में 4

नरोत्तम दास ठाकुर · प्रार्थना

  • पद 1भजन
    राधा-कृष्ण-सेवोन् मुञि जीवने मरणे
    ताँर स्थान तँर लीला देखोँ रात्रि दिने
  • पद 1अर्थ
    मैं इस जीवन में और मृत्यु के बाद भी राधा-कृष्ण की सेवा करूँगा। रात और दिन मैं उनके दिव्य धाम और लीला का दर्शन करूँगा।
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में 3

श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    जय जय अद्वैत आचार्य दयामय
    यार हुहुङ्कारे गौर अबतार हय
  • पद 1अर्थ
    दयामय अद्वैत आचार्य की जय जय हो! उनकी उच्च पुकार के कारण ही भगवान गौर इस जगत में अवतरित हुए।
2 पद भजन में 1 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतमाला

  • पद 1भजन
    निर्जन कुटीरे श्री राधा चरण
    स्मरणे थाकिबो रत
    श्री रूप मञ्जरी धिरे धिरे आसि'
    कोहिबे आमाय कोत
  • पद 4भजन
    साखात दर्शन मध्याह्न-लीलाय
    राधा-पद-सेबार्थिनी
    जखन जे सेबा कोरोहो जतने
    श्री-राधा-चरणे धनि
  • पद 4अर्थ
    हे राधा-चरणों की सेवा की अभिलाषी, अब तुम श्रीराधा की मध्याह्न-लीला का साक्षात् दर्शन कर सकती हो। हे सौभाग्यशालिनी सुन्दरी, श्रीराधा के चरणों की सावधानीपूर्वक सेवा करो।"
1 पद भजन में 2 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतमाला

  • पद 1भजन
    राधा-कृष्ण-गुण-गान मिथासक्ति सम्बर्धन
    उभयाभिसार सम्पदन
    कृष्ण सखी-समर्पण नर्म-बाक्य-आस्वादन
    उभयेर सुबेश-रचन
  • पद 1अर्थ
    1. श्री श्री राधा-कृष्ण की महिमा का गान करना, 2. राधा-कृष्ण को परस्पर और अधिक अनुरक्त करना, 3. दोनों के गुप्त मिलन की व्यवस्था करना, 4. सखियों को कृष्ण को समर्पित करना, 5. मधुर हास-परिहास की बातें कहना, 6. दोनों को वस्त्राभूषणों से सजाना, . . .
  • पद 3अर्थ
    . . . 13. दोनों का ध्यान करना, 14. भूल होने पर उसके प्रायश्चित्त हेतु उपहार देना, 15. दोनों के परस्पर पत्र ले जाना, और 16. राधा के संकट या विपत्ति के समय अत्यंत कुशलता से उनके प्राणों की रक्षा करना, ये सामान्य सखियों के कर्तव्य हैं।
1 पद भजन में 2 पद अर्थ में

रूप गोस्वामी

  • पद 1भजन
    राधा सखि जल-केलिषु निपुणा
    खेलति निज-कुण्डे मधुरिपुणा
  • पद 1अर्थ
    जल-क्रीड़ा में निपुण राधा अपने ही कुण्ड में मधु के शत्रु मधुरिपु के साथ क्रीड़ा करती हैं।
  • पद 4अर्थ
    आनन्द के भार से कृष्ण का नित्य ओज ढीला पड़ जाता है, जबकि राधा का साहस, जो प्रियतम की हार का लक्षण है, बढ़ता ही जाता है।
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में 1

नरोत्तम दास ठाकुर · प्रार्थना

  • पद 1भजन
    जय जय श्री-कृष्ण-चैतन्य नित्यानन्द
    जयाद्वैतचन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द
  • पद 1अर्थ
    जय जय श्री कृष्ण चैतन्य, नित्यानन्द की जय! जय अद्वैतचन्द्र, जय गौर-भक्तवृन्द की जय!
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में 1

भक्तिविनोद ठाकुर · कल्याण-कल्पतरु

  • पद 1भजन
    श्री-राधा-कृष्ण-पद-कमले मन
    केमोने लोभिबे चरम शरण
  • पद 1अर्थ
    हे मेरे मन, श्री राधा-कृष्ण के चरण-कमलों में तुझे अंतिम शरण कैसे मिलेगी?
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में 1

श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    जय जय अद्वैत अचार्य महाशय
    अबतीर्ण हैल जीबे ह-इय सदय
  • पद 1अर्थ
    जय जय अद्वैत आचार्य महाशय की, जो पतित जीवों के उद्धार हेतु कृपापूर्वक इस जगत में अवतरित हुए।
2 पद भजन में

वासुदेव घोष · गौड़ीय वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    जय जय ध्वनि उठे नदीया नगरे
    गोरा अभिषेक आजि पण्डितेर घरे
  • पद 5भजन
    जय रे गौराङ्ग जय अद्वैत निता-इ
    बलि भक्त-गण आसे करि धा-ओयाधा-इ
2 पद भजन में

श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    जय जय गौर-हरि शचीर नन्दन
    श्री-चैतन्य बिश्वम्भर पतित-पाबन
  • पद 2भजन
    जय महाप्रभु गौरचन्द्र दयामय
    अधम-तारण नाथ बहक्त-आश्रय
2 पद भजन में

जीव गोस्वामी · गोपाल-चम्पू

  • पद 1भजन
    जय जय सद्-गुण-सर
    जगति विशिष्टं कलयितुम् इष्टं गोकुल-लसद्-अवतर
  • पद 16भजन
    कवि-कृत-निश्चय-शुभ्र-यशश्-चय मल-समुदय-हरिन्
    जय जय जय जय जय जय जय जय जय जय रस-विहरिन्