तुवा भक्ति प्रतिकूल धर्म जा’ते रोय्
आपकी भक्ति के प्रतिकूल जो कुछ भी है, उसे मैं बड़ी सावधानी से अवश्य त्याग दूँगा।
आपकी भक्ति से विमुख लोगों की संगति मैं नहीं करूँगा। श्री गौरांग के विरोधियों का मुख भी मैं नहीं देखूँगा।
भक्ति के प्रतिकूल स्थान में मैं निवास नहीं करूँगा। भक्ति के प्रतिकूल कार्यों में मुझे कोई प्रीति नहीं होगी।
भक्ति के विरोधी ग्रंथों को मैं नहीं पढ़ूँगा। भक्ति के विरोधी व्याख्यानों को मैं कभी नहीं सुनूँगा।
श्री गौरांग से रहित स्थान को मैं तीर्थ नहीं मानूँगा। भक्ति में बाधा डालने वाले ज्ञान और कर्म को मैं तुच्छ समझूँगा।
भक्ति में बाधक समय से मुझे कोई प्रेम नहीं होगा। भक्ति से विमुख अपने संबंधियों को भी मैं पराया समझूँगा।
भक्ति में बाधा डालने वाली सब इच्छाओं को मैं त्याग दूँगा। अभक्तों के दिए हुए अन्न को मैं स्वीकार नहीं करूँगा।
भक्ति के प्रतिकूल जो कुछ भी मैं जानूँगा, उसे सावधानी से त्याग दूँगा। यही मेरा दृढ़ संकल्प है।
प्रभु के चरणों में गिरकर भक्तिविनोद उस शक्ति की भिक्षा माँगता है, जिससे भक्ति के प्रतिकूल सब कुछ त्यागा जा सके।