बस्तुतः सकलि तव, जीव केहो नोय्
वास्तव में सब कुछ आपका ही है, जीव का अपना कुछ भी नहीं है। परन्तु 'मैं' और 'मेरा' के भ्रम में भटकता हुआ जीव शोक और भय का अनुभव करता है।
बद्ध जीव अपने मन में गहराई से 'मैं' और 'मेरा' के इन भ्रमों को ही अपनी एकमात्र संपत्ति मान लेता है।
इस भ्रम के कारण संसार में गिरकर, मैं भव-सागर में डूबते-उबरते हुए तैरने का प्रयास कर रहा हूँ।
आपके अभय चरणों की शरण लेकर, आज मैंने अपने आप को आपको सौंप दिया है।
'मैं' और 'मेरा' के वे भ्रम अब मुझसे दूर हो गए हैं, ताकि वे फिर कभी मेरे हृदय में स्थान न पा सकें।
हे प्रभु! मुझे केवल यही एक शक्ति दे दीजिए, कि मैं मिथ्या अहंकार और ममता को सदा दूर रख सकूँ।
आत्म-निवेदन का यह भाव मेरे हृदय में सदा दृढ़ बना रहे, यह हाथी के स्नान के समान क्षणभर के लिए न रहे।
श्री नित्यानन्द प्रभु के चरणों में भक्तिविनोद उस कृपा की भिक्षा माँगता है, जिससे 'मैं' और 'मेरा' के ये भ्रम सदा के लिए मिट जाएँ।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
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- 8