आमार बोलिते प्रभु
हे प्रभु! 'मेरा' कहने योग्य और कुछ भी नहीं है। तुम ही मेरे पिता हो, तुम ही मेरे बन्धु हो, और तुम ही मेरे भाई हो।
मेरे बन्धु, पत्नी, पुत्र और पुत्रियाँ, सब तुम्हारे ही दास-दासी हैं। मेरे सभी प्रयास इसी सम्बन्ध पर आधारित हैं।
धन, परिजन, घर-द्वार, सबको 'तुम्हारा' मानकर, मैं केवल तुम्हारा सेवक बनकर उनकी रक्षा करता हूँ।
तुम्हारे ही कार्य के लिये मैं धन कमाऊँगा, और तुम्हारे घर का व्यय भी मैं ही वहन करूँगा।
अच्छा-बुरा मैं कुछ नहीं जानता, केवल सेवा करता हूँ। तुम्हारे घर में मैं मात्र सम्पत्ति का प्रहरी हूँ।
तुम्हारी ही इच्छा से मेरी इन्द्रियाँ चलती हैं, सुनने, देखने, सूँघने, खाने की सभी इच्छाएँ तुम्हारे अधीन हैं।
अब अपने सुख के लिये मैं और कुछ नहीं करता। भक्तिविनोद कहते हैं: तुम्हारा सुख ही सार है।
इस भजन के बारे में
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- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
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ऑडियो के लिए आभार: इस्कॉन डिज़ायर ट्री। सभी भक्त गायकों की जय।